प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जून को दो साल की 9,585 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी, जिसके तहत दिल्ली-एनसीआर में बीएस-IV या उससे पुराने करीब 2.07 लाख ट्रक और बसों को बीएस-VI या इलेक्ट्रिक वाहनों से बदला जाएगा।
नई दिल्ली, 4 जून। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की दमघोंटू हवा से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार, 3 जून को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में दो वर्ष की 9,585 करोड़ रुपये की क्लीन मोबिलिटी योजना को मंजूरी दी गई। इस योजना का मकसद दिल्ली-एनसीआर में चल रहे पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले व्यावसायिक वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाकर उनकी जगह स्वच्छ ईंधन और इलेक्ट्रिक वाहनों को लाना है।
योजना में क्या है
योजना के तहत बीएस-IV या उससे पुराने उत्सर्जन मानकों वाले ट्रक और बसों के मालिकों को प्रोत्साहन राशि देकर उन्हें बीएस-VI अनुपालन वाले या इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के लिए प्रेरित किया जाएगा। सरकारी अनुमान के अनुसार इस योजना से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के एनसीआर हिस्से में करीब 2.07 लाख वाहन मालिक लाभान्वित होंगे, जिनमें लगभग 1.91 लाख ट्रक और 16,329 बसें शामिल हैं। योजना का कुल वित्तीय परिव्यय 9,585 करोड़ रुपये है, जिसमें 5,041 करोड़ रुपये केंद्र सरकार वहन करेगी और करीब 1,601 करोड़ रुपये की कर रियायतें भाग लेने वाले राज्यों की ओर से दी जाएंगी।
क्यों जरूरी थी यह योजना
दिल्ली और उससे सटे इलाके पिछले एक दशक से जाड़े के महीनों में गंभीर वायु प्रदूषण की चपेट में रहते हैं। डीजल से चलने वाले पुराने व्यावसायिक वाहनों को इस प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोतों में गिना जाता है। बीएस-I, बीएस-II, बीएस-III और बीएस-IV श्रेणी के वाहन आधुनिक बीएस-VI वाहनों की तुलना में कई गुना अधिक नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर छोड़ते हैं। सरकार का मानना है कि इन वाहनों को बाजार से हटाकर हवा की गुणवत्ता में ठोस सुधार लाया जा सकता है और साथ ही स्वच्छ परिवहन की ओर बढ़ने की व्यापक रणनीति को गति मिल सकती है।
सरकार का तर्क
सरकारी सूत्रों के अनुसार यह योजना केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध सार्वजनिक स्वास्थ्य, रोजगार और घरेलू वाहन उद्योग से भी है। पुराने वाहनों को हटाने और नए स्वच्छ वाहनों की मांग बढ़ने से ऑटोमोबाइल विनिर्माण, बैटरी और चार्जिंग ढांचे जैसे क्षेत्रों में निवेश और रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री ने अपने प्रतिक्रिया संदेश में इस फैसले को दिल्ली-एनसीआर के नागरिकों के लिए स्वच्छ और स्वस्थ जीवन की दिशा में बड़ा कदम बताया। उन्होंने कहा कि स्वच्छ गतिशीलता को बढ़ावा देना सरकार की प्राथमिकता है और यह योजना उसी संकल्प का हिस्सा है।
राज्यों और हितधारकों की भूमिका
चूँकि एनसीआर चार राज्यों में फैला हुआ है, इसलिए योजना को केंद्र और राज्यों के साझा सहयोग के ढांचे में रखा गया है। परिवहन संघों और बेड़ा संचालकों ने प्रोत्साहन राशि का स्वागत किया है, लेकिन कुछ ने यह भी कहा है कि नए इलेक्ट्रिक ट्रकों और बसों की ऊँची शुरुआती लागत तथा चार्जिंग ढांचे की कमी व्यावहारिक चुनौती बनी रहेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रोत्साहन राशि कितनी आसानी से और समय पर वाहन मालिकों तक पहुँचती है, तथा स्क्रैपिंग और पंजीकरण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है।
पर्यावरणविदों की राय
पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इस कदम को सही दिशा में बताया है, पर उनका कहना है कि अकेले वाहन बदलने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। उनके अनुसार पराली जलाना, निर्माण-स्थलों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और बिजली संयंत्रों जैसे अन्य स्रोतों पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। फिर भी अधिकांश विशेषज्ञ मानते हैं कि व्यावसायिक वाहन क्षेत्र का संक्रमण एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ ठोस और मापनीय सुधार संभव है, और इस लिहाज से योजना का दायरा महत्वपूर्ण है। हर सर्दी में जब दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 'गंभीर' श्रेणी में पहुँचता है, तब वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) को ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) के तहत ट्रकों के प्रवेश और निर्माण कार्य पर रोक जैसे आपातकालीन कदम उठाने पड़ते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पुराने डीजल वाहन ही सड़कों से हट जाएँ तो ऐसे आपातकालीन प्रतिबंधों की आवश्यकता धीरे-धीरे कम हो सकती है।
पहले के प्रयास और सबक
यह पहला अवसर नहीं है जब सरकार ने पुराने वाहनों को हटाने का प्रयास किया हो। इससे पहले राष्ट्रीय हरित अधिकरण और न्यायालयों के आदेशों के तहत दिल्ली में 15 वर्ष से पुराने पेट्रोल और 10 वर्ष से पुराने डीजल वाहनों के पंजीकरण रद्द किए जाते रहे हैं। स्वैच्छिक वाहन स्क्रैपिंग नीति भी पहले से लागू है। लेकिन व्यावसायिक बेड़ा संचालकों के लिए नए वाहन की ऊँची लागत हमेशा सबसे बड़ी बाधा रही है। इस बार सरकार ने प्रत्यक्ष प्रोत्साहन और कर रियायत का मॉडल अपनाकर इसी आर्थिक बाधा को दूर करने का प्रयास किया है, ताकि वाहन मालिक स्वेच्छा से पुराने वाहन छोड़कर स्वच्छ विकल्प अपनाएँ। ऑटोमोबाइल विनिर्माताओं के संगठन ने भी इस कदम को मांग बढ़ाने वाला बताते हुए स्वागत किया है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
योजना पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी सामने आईं। सत्ता पक्ष ने इसे पर्यावरण के प्रति केंद्र की गंभीरता का प्रमाण बताया, जबकि कुछ विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाया कि इतने वर्षों बाद आई यह योजना जमीन पर कितनी प्रभावी होगी और प्रोत्साहन राशि वास्तव में किस गति से वितरित होगी। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों के बीच समन्वय भी इसकी सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि कर रियायत का हिस्सा राज्यों को वहन करना है। विश्लेषकों का कहना है कि बहु-राज्यीय योजना में एकरूपता और समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करना अपने आप में एक प्रशासनिक चुनौती है।
आगे क्या
योजना दो वर्ष की अवधि के लिए है और इसकी समय-समय पर समीक्षा की जाएगी। सरकार को अब इसके क्रियान्वयन के लिए विस्तृत दिशानिर्देश, प्रोत्साहन की दरें और आवेदन प्रक्रिया तय करनी होगी। पंजीकृत वाहन स्क्रैपिंग सुविधाओं (आरवीएसएफ) का एक मजबूत नेटवर्क, पारदर्शी डिजिटल प्रक्रिया और समय पर भुगतान इसकी सफलता की कुंजी होंगे। यदि यह मॉडल दिल्ली-एनसीआर में सफल रहता है तो भविष्य में इसे देश के अन्य प्रदूषित शहरों में भी लागू किए जाने की संभावना है। फिलहाल सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि घोषणा से जमीन पर अमल तक का सफर कितनी तेजी और पारदर्शिता से तय होता है, क्योंकि नागरिकों के लिए असली परीक्षा हवा की गुणवत्ता में दिखने वाले वास्तविक सुधार में होगी।