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विमान ईंधन की मार से एयरलाइनों को राहत: कैबिनेट ने मंजूर किया 10,000 करोड़ का एटीएफ स्थिरीकरण कोष

पश्चिम एशिया संकट के कारण विमान ईंधन (एटीएफ) की कीमतों में भारी उछाल के बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जून को 10,000 करोड़ रुपये का एटीएफ मूल्य स्थिरीकरण कोष मंजूर किया, ताकि भारतीय एयरलाइनों को ईंधन झटके से बचाया जा सके।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 38 बार देखा
विमान ईंधन की मार से एयरलाइनों को राहत: कैबिनेट ने मंजूर किया 10,000 करोड़ का एटीएफ स्थिरीकरण कोष
एक भारतीय एयरलाइन का विमान। विमान ईंधन की कीमतों में उछाल से एयरलाइनों को बचाने के लिए कैबिनेट ने 10,000 करोड़ का स्थिरीकरण कोष मंजूर किया। (तस्वीर: विकिमीडिया कॉमन्स)

नई दिल्ली, 3 जून। विमान ईंधन (एटीएफ) की कीमतों में आए भारी उछाल से जूझ रही भारतीय एयरलाइनों को बड़ी राहत देते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक बार के 10,000 करोड़ रुपये के बजटीय पैकेज को मंजूरी दी है, जिससे एटीएफ मूल्य स्थिरीकरण कोष की स्थापना होगी। यह फैसला 3 जून को लिया गया। इस कोष को पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से उत्पन्न ईंधन झटके से देश के विमानन क्षेत्र को बचाने के लिए एक व्यापक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।

कोष कैसे काम करेगा

योजना के तहत सरकार पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के माध्यम से सरकारी तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को 10,000 करोड़ रुपये तक की ब्याज-मुक्त अग्रिम राशि उपलब्ध कराएगी। यह सुविधा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों उड़ानें संचालित करने वाली सभी इच्छुक अनुसूचित भारतीय एयरलाइनों के लिए उपलब्ध होगी। भाग लेने वाली एयरलाइनें ओएमसी से एक निश्चित-मूल्य व्यवस्था के तहत तीन वर्ष तक ईंधन खरीद सकेंगी, जिसकी सालाना समीक्षा होगी।

तेल कंपनियों की क्षतिपूर्ति

इस व्यवस्था में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में एटीएफ की कीमतें सरकार द्वारा तय किए गए बेंचमार्क से ऊपर जाएँगी, तब तेल विपणन कंपनियों को क्षतिपूर्ति दी जाएगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव का पूरा बोझ सीधे एयरलाइनों और अंततः यात्रियों पर न पड़े। सरकार का मानना है कि स्थिर ईंधन लागत से एयरलाइनों की वित्तीय स्थिति को सहारा मिलेगा और हवाई संपर्क तथा पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

संकट की पृष्ठभूमि

यह आपातकालीन व्यवस्था ऐसे समय में आई है जब पश्चिम एशिया में संकट के कारण विमान ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आया है। आँकड़ों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय एटीएफ कीमतें मार्च 2026 के 60.50 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर मई 2026 में लगभग 142 रुपये प्रति लीटर तक पहुँच गईं — यानी करीब 135 प्रतिशत की वृद्धि। एयरलाइनों के परिचालन व्यय में ईंधन की हिस्सेदारी सबसे बड़ी होती है, इसलिए इतनी तेज वृद्धि से उनकी लाभप्रदता पर गंभीर दबाव पड़ा है।

उद्योग की प्रतिक्रिया

विमानन क्षेत्र ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि भू-राजनीतिक घटनाओं के कारण ईंधन कीमतों में अचानक आने वाले झटके एयरलाइनों के लिए सबसे बड़े जोखिमों में से एक हैं, और यह कोष ऐसी अनिश्चितता के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच का काम करेगा। उनका मानना है कि स्थिर ईंधन लागत से किराए को अपेक्षाकृत स्थिर रखने और परिचालन की योजना बेहतर ढंग से बनाने में मदद मिलेगी।

एटीएफ की कीमत कैसे तय होती है

भारत में विमान ईंधन की कीमत मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल और जेट ईंधन की कीमतों, रुपये-डॉलर विनिमय दर तथा राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले मूल्य वर्धित कर (वैट) पर निर्भर करती है। एटीएफ अभी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे से बाहर है, जिसके कारण अलग-अलग राज्यों में इसकी कीमत में काफी अंतर रहता है। विमानन उद्योग लंबे समय से एटीएफ को जीएसटी के दायरे में लाने की माँग करता रहा है ताकि कर का बोझ कम हो और कीमतों में एकरूपता आए। जब वैश्विक स्तर पर तेल कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तो इसका सीधा और तीव्र असर एयरलाइनों की लागत पर पड़ता है, क्योंकि ईंधन उनके कुल परिचालन व्यय का सबसे बड़ा घटक होता है।

किन एयरलाइनों को राहत

यह कोष देश की सभी प्रमुख अनुसूचित एयरलाइनों के लिए उपलब्ध होगा, जिनमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मार्गों पर परिचालन करने वाली कंपनियाँ शामिल हैं। भारतीय विमानन बाजार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है और यात्रियों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुँची है। ऐसे में ईंधन लागत में अचानक उछाल न केवल एयरलाइनों की वित्तीय सेहत बल्कि किरायों और हवाई संपर्क पर भी असर डाल सकता है। इस कोष का उद्देश्य इस झटके को अवशोषित करना और क्षेत्र की वृद्धि की गति को बनाए रखना है, ताकि छोटे शहरों तक हवाई संपर्क का विस्तार बाधित न हो।

यात्रियों पर असर

विश्लेषकों का कहना है कि ईंधन कीमतों में स्थिरता का अप्रत्यक्ष लाभ यात्रियों को भी मिल सकता है, क्योंकि एयरलाइनों पर अचानक लागत बढ़ने का दबाव कम होगा। हालाँकि वे यह भी रेखांकित करते हैं कि यह कोष एक अस्थायी और लक्षित हस्तक्षेप है, और दीर्घकाल में विमानन क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता ईंधन कर ढाँचे, बुनियादी ढाँचे और परिचालन दक्षता जैसे व्यापक कारकों पर निर्भर करेगी। कुछ जानकार यह भी मानते हैं कि इस तरह की सब्सिडी-आधारित व्यवस्था को संतुलित ढंग से लागू करना आवश्यक है, ताकि बाजार की प्रतिस्पर्धा प्रभावित न हो।

आगे क्या

सरकार को अब इस कोष के क्रियान्वयन के लिए विस्तृत दिशानिर्देश, बेंचमार्क मूल्य तय करने की पद्धति और एयरलाइनों की भागीदारी की शर्तें स्पष्ट करनी होंगी। आने वाले महीनों में देखा जाएगा कि पश्चिम एशिया की स्थिति कैसे विकसित होती है और एटीएफ कीमतें किस दिशा में जाती हैं। यदि वैश्विक कीमतें ऊँची बनी रहती हैं, तो यह कोष भारतीय एयरलाइनों के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा साबित हो सकता है, जबकि कीमतों में नरमी आने पर इसकी समीक्षा भी संभव है।

स्रोत: Business Standard
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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