राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आँकड़ों के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026 की जनवरी-मार्च तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो आरबीआई और बाजार के अनुमानों से अधिक है। पूरे वित्त वर्ष की वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही।
नई दिल्ली, 30 मई। भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026 का समापन मजबूत प्रदर्शन के साथ किया है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार जनवरी-मार्च (चौथी) तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर बढ़कर 7.8 प्रतिशत हो गई, जबकि पूरे वित्त वर्ष की वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही। यह आँकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक तथा अधिकांश बाजार विश्लेषकों के अनुमानों से बेहतर रहा, जिन्होंने चौथी तिमाही की वृद्धि लगभग 7.0 से 7.3 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया था।
सेवा क्षेत्र बना विकास का इंजन
आँकड़ों के अनुसार चौथी तिमाही में सबसे बड़ा योगदान सेवा क्षेत्र का रहा, जिसने 9.9 प्रतिशत की दर से विस्तार किया। इसमें व्यापार, होटल, परिवहन, संचार और प्रसारण सेवाओं ने 12.5 प्रतिशत की तेज वृद्धि दर्ज की, वहीं वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाओं में 10.4 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। सेवा क्षेत्र की यह मजबूती भारत की घरेलू माँग और उपभोग की ताकत को दर्शाती है, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद अर्थव्यवस्था को सहारा देती रही।
उद्योग और निर्माण की भूमिका
उद्योग क्षेत्र ने मार्च तिमाही में 7.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जिसमें निर्माण क्षेत्र 8.4 प्रतिशत और विनिर्माण 7.3 प्रतिशत की दर से बढ़ा। निर्माण क्षेत्र की मजबूती बुनियादी ढाँचे पर सार्वजनिक और निजी निवेश के बढ़ते प्रवाह का संकेत है, जबकि विनिर्माण की वृद्धि घरेलू माँग और सरकार की उत्पादन-प्रोत्साहन पहलों से जुड़ी मानी जा रही है। समग्र रूप से ये आँकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि कई क्षेत्रों में फैली हुई और संतुलित है।
निवेश में उछाल
आँकड़ों का एक उत्साहजनक पहलू निवेश से जुड़ा है। वित्त वर्ष 2026 में निजी निवेश घोषणाएँ बढ़कर 56 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गईं, जो वित्त वर्ष 2025 के 37 लाख करोड़ रुपये से कहीं अधिक हैं। वहीं कुल निवेश घोषणाएँ रिकॉर्ड 80 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचीं। निवेश में यह उछाल भविष्य की आर्थिक गतिविधि, रोजगार सृजन और उत्पादन क्षमता के विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नीतिगत संदर्भ
मजबूत वृद्धि के ये आँकड़े ऐसे समय में आए हैं जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और बाहरी माँग की अनिश्चितता बनी हुई है। ऐसे माहौल में 7.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि भारत को विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बनाए रखती है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि घरेलू उपभोग, सेवा निर्यात और सार्वजनिक पूँजीगत व्यय इस वृद्धि के प्रमुख स्तंभ रहे हैं।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
सेवा और उद्योग के साथ-साथ कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन भी समग्र वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण रहा। अच्छे मानसून और बेहतर फसल उत्पादन ने ग्रामीण आय और माँग को सहारा दिया, जिसका असर उपभोक्ता वस्तुओं और दोपहिया वाहनों जैसे क्षेत्रों में दिखाई दिया। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती को इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि देश की बड़ी आबादी अब भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ग्रामीण माँग में निरंतर सुधार बना रहता है, तो यह समग्र आर्थिक वृद्धि को और व्यापक तथा संतुलित आधार प्रदान करेगा।
वैश्विक तुलना में भारत
7.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर भारत को विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में बनाए रखती है। ऐसे समय में जब कई विकसित अर्थव्यवस्थाएँ धीमी वृद्धि और ऊँची मुद्रास्फीति से जूझ रही हैं, भारत की यह रफ्तार वैश्विक निवेशकों का ध्यान आकर्षित कर रही है। हालाँकि अर्थशास्त्री यह भी रेखांकित करते हैं कि सकल वृद्धि दर के साथ-साथ रोजगार सृजन, आय में वृद्धि और असमानता में कमी जैसे संकेतक भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, ताकि वृद्धि का लाभ व्यापक आबादी तक पहुँचे।
विशेषज्ञों की राय
विश्लेषकों का मानना है कि अनुमान से बेहतर वृद्धि भारत की आर्थिक बुनियाद की मजबूती को दर्शाती है, लेकिन आगे की राह चुनौतियों से खाली नहीं है। उनका कहना है कि निजी निवेश को व्यापक आधार देना, ग्रामीण माँग को मजबूत बनाना और वैश्विक व्यापार के दबावों से निपटना नीति-निर्माताओं के लिए प्रमुख प्राथमिकताएँ रहेंगी। कुछ विशेषज्ञ यह भी रेखांकित करते हैं कि उच्च वृद्धि का लाभ रोजगार और आय के रूप में व्यापक आबादी तक पहुँचाना उतना ही जरूरी है जितना समग्र वृद्धि दर को ऊँचा बनाए रखना। वैश्विक तेल कीमतों में उछाल और बाहरी माँग की अनिश्चितता को वे निकट भविष्य के प्रमुख जोखिमों में गिनाते हैं।
आगे क्या
इन आँकड़ों के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर रहेंगी कि चालू वित्त वर्ष में वृद्धि की गति कैसी रहती है और मानसून, वैश्विक तेल कीमतें तथा बाहरी माँग जैसे कारक इसे किस तरह प्रभावित करते हैं। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति और सरकार के पूँजीगत व्यय की दिशा आने वाली तिमाहियों में वृद्धि की राह तय करने में अहम भूमिका निभाएँगी। फिलहाल मजबूत समापन ने अर्थव्यवस्था को नए वित्त वर्ष में आशावादी आधार प्रदान किया है।