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कैपिटल ग्रुप का अडानी पर 2 अरब डॉलर का दांव, रिलायंस से हटकर बदली रणनीति

दुनिया की सबसे बड़ी निवेश प्रबंधन कंपनियों में शामिल कैपिटल ग्रुप ने हाल के हफ्तों में अडानी समूह की तीन कंपनियों में 2 अरब डॉलर से अधिक की हिस्सेदारी खरीदी है, जबकि रिलायंस इंडस्ट्रीज में अपनी हिस्सेदारी लगातार घटाई है।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 26 बार देखा
कैपिटल ग्रुप का अडानी पर 2 अरब डॉलर का दांव, रिलायंस से हटकर बदली रणनीति
अडानी समूह का लोगो। कैपिटल ग्रुप ने समूह की तीन कंपनियों में 2 अरब डॉलर से अधिक की हिस्सेदारी खरीदी है। (तस्वीर: विकिमीडिया कॉमन्स)

मुंबई, 22 मई। भारत के दो सबसे बड़े कारोबारी समूहों के बीच विदेशी निवेशकों की प्राथमिकता में बदलाव का संकेत देते हुए, दुनिया की सबसे बड़ी निवेश प्रबंधन कंपनियों में शामिल कैपिटल ग्रुप ने अडानी समूह की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है। लॉस एंजिल्स स्थित इस निवेश प्रबंधक ने हाल के हफ्तों में अडानी समूह की तीन कंपनियों में 2 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की हिस्सेदारी खरीदी है। यह कदम ऐसे समय में आया है जब कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज में अपनी होल्डिंग लगातार घटा रही है।

कहाँ-कहाँ खरीदी हिस्सेदारी

उपलब्ध जानकारी के अनुसार 5 मई को कैपिटल ग्रुप ने अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड में खुले बाजार के सौदों के जरिए लगभग 2 प्रतिशत हिस्सेदारी 74.86 अरब रुपये (करीब 77.6 करोड़ डॉलर) में खरीदी। इसके अलावा निवेशक ने अडानी पावर लिमिटेड और अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड में भी बाजार से खरीद के जरिए 1.5 से 2 प्रतिशत के बीच हिस्सेदारी जुटाई है। इन सौदों ने अडानी समूह की कंपनियों में बड़े वैश्विक निवेशकों की बढ़ती रुचि को रेखांकित किया है।

रिलायंस से हटता रुझान

कैपिटल ग्रुप का यह कदम केवल अडानी में निवेश बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ ही कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज में अपनी हिस्सेदारी घटाती रही है। आँकड़ों के अनुसार मार्च के अंत तक कंपनी के पास रिलायंस इंडस्ट्रीज के करीब 14.2 करोड़ शेयर थे, जबकि छह वर्ष पहले यह संख्या लगभग 50 करोड़ थी। यह बदलाव भारत के दो सबसे बड़े समूहों के बीच एक प्रमुख वैश्विक निवेशक की प्राथमिकता में आए परिवर्तन को दर्शाता है।

क्यों आकर्षक हैं अडानी की कंपनियाँ

विश्लेषकों के अनुसार अडानी समूह की कंपनियों को भारत के बुनियादी ढाँचे के विकास, ऊर्जा संक्रमण और विनिर्माण को बढ़ावा देने पर एक 'लीवरेज्ड' दांव के रूप में देखा जा रहा है। बंदरगाह, बिजली और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में समूह की मजबूत उपस्थिति इसे उन निवेशकों के लिए आकर्षक बनाती है, जो भारत की दीर्घकालिक ढाँचागत वृद्धि पर भरोसा कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में सरकार के पूँजीगत व्यय और नीतिगत प्राथमिकताओं ने भी निवेशकों के उत्साह को बढ़ाया है।

व्यापक संदर्भ

यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब भारतीय कॉर्पोरेट जगत में बड़े पैमाने पर पूँजी प्रवाह और रणनीतिक पुनर्संरचना देखी जा रही है। बड़े वैश्विक फंड भारत की वृद्धि-गाथा में हिस्सेदारी के लिए विभिन्न समूहों और क्षेत्रों में अपने दांव को संतुलित कर रहे हैं। किसी एक समूह से दूसरे की ओर झुकाव अक्सर उस समूह के मूल्यांकन, वृद्धि-संभावना और क्षेत्रीय अवसरों के आकलन पर निर्भर करता है। इस लिहाज से कैपिटल ग्रुप का कदम भारतीय बाजार में विदेशी निवेश की बदलती गतिशीलता का एक उल्लेखनीय उदाहरण है।

अडानी समूह की पुनर्वापसी

यह निवेश ऐसे समय में आया है जब अडानी समूह ने कुछ वर्ष पूर्व आई चुनौतियों के बाद अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत किया है। समूह ने अपने कर्ज को नियंत्रित करने, नकदी प्रवाह बढ़ाने और पूँजीगत व्यय को अनुशासित रखने पर ध्यान केंद्रित किया है। बंदरगाह, ऊर्जा, सीमेंट और हवाई अड्डों जैसे क्षेत्रों में फैले इसके कारोबार ने मजबूत परिचालन आय दर्ज की है। बड़े वैश्विक निवेशकों की वापसी को समूह की वित्तीय बुनियाद और उसके दीर्घकालिक दृष्टिकोण में बढ़ते भरोसे के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

ऊर्जा संक्रमण पर दांव

अडानी समूह ने हरित ऊर्जा और ऊर्जा संक्रमण के क्षेत्र में महत्वाकांक्षी निवेश योजनाओं की घोषणा की है, जिनमें सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। भारत के स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों और बढ़ती बिजली माँग को देखते हुए ये क्षेत्र दीर्घकालिक वृद्धि के प्रमुख चालक माने जा रहे हैं। यही कारण है कि अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी पावर जैसी कंपनियाँ उन वैश्विक निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं जो भारत के ढाँचागत और ऊर्जा-संक्रमण अवसरों पर दांव लगाना चाहते हैं।

विशेषज्ञों की राय

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के पुनर्संतुलन को किसी एक समूह के पक्ष या विपक्ष में अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह बड़े फंडों की निरंतर चलने वाली पोर्टफोलियो-रणनीति का हिस्सा है। वे रेखांकित करते हैं कि दोनों ही समूह अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत हैं और निवेशक समय-समय पर मूल्यांकन और संभावनाओं के आधार पर अपने आवंटन में बदलाव करते रहते हैं। फिर भी, इतने बड़े दांव का सार्वजनिक होना बाजार की धारणा को प्रभावित करता है।

आगे क्या

इस घटनाक्रम के बाद निवेशकों और विश्लेषकों की निगाहें इस पर रहेंगी कि अन्य बड़े वैश्विक फंड किस दिशा में कदम बढ़ाते हैं और अडानी तथा रिलायंस, दोनों समूहों के शेयरों में संस्थागत भागीदारी कैसे विकसित होती है। व्यापक रूप से, यह प्रवृत्ति इस बात का संकेत है कि भारत की बुनियादी ढाँचा और ऊर्जा-संक्रमण कहानी वैश्विक पूँजी को आकर्षित कर रही है, जो आने वाले समय में बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

स्रोत: Business Standard
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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