सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून को एक ऐतिहासिक फैसले में गृहिणियों के योगदान को 'राष्ट्र निर्माता' की संज्ञा देते हुए कहा कि सड़क दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु पर घरेलू देखभाल की क्षति को अलग मद के रूप में, कम से कम 30,000 रुपये मासिक की दर से मुआवजे में जोड़ा जाना चाहिए।
नई दिल्ली, 11 जून। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों के योगदान को कानूनी मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। 11 जून को दिए गए निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के योगदान को 'राष्ट्र निर्माता' की संज्ञा दी और कहा कि किसी गृहिणी की मोटर वाहन दुर्घटना में मृत्यु होने पर परिवार को होने वाली घरेलू देखभाल की क्षति को मुआवजे में एक अलग और स्वतंत्र मद के रूप में शामिल किया जाना चाहिए। न्यायालय ने इस क्षति का मूल्य कम से कम 30,000 रुपये प्रति माह आँका।
फैसले का सार
अदालत ने स्पष्ट किया कि गृहिणी द्वारा घर में किया जाने वाला काम — बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, भोजन तैयार करना, घर का प्रबंधन — किसी भी रूप में आर्थिक गतिविधि से कम नहीं है। यदि इस काम को बाजार से खरीदना पड़े तो उसकी एक ठोस कीमत होती है। इसलिए जब किसी दुर्घटना में गृहिणी की जान चली जाती है तो परिवार को न केवल भावनात्मक बल्कि एक वास्तविक आर्थिक हानि भी होती है, जिसकी भरपाई मुआवजे में होनी चाहिए। मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 166 के तहत दायर दावों में इस सिद्धांत को लागू किया गया।
क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण
भारत में करोड़ों महिलाएँ बिना किसी प्रत्यक्ष वेतन के घर सँभालती हैं और उनके श्रम को अक्सर 'अनदेखा' या 'गैर-आर्थिक' मान लिया जाता है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अर्थशास्त्री लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि घरेलू और देखभाल संबंधी अवैतनिक श्रम का मूल्य सकल घरेलू उत्पाद में दर्ज नहीं होता, जबकि उसके बिना अर्थव्यवस्था चल ही नहीं सकती। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उसी अनदेखे योगदान को कानूनी और मौद्रिक मान्यता देने की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
मुआवजे की गणना पर असर
अब तक दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण गृहिणी की मृत्यु पर मुआवजा तय करते समय अक्सर बहुत कम 'काल्पनिक आय' मानते थे, जिससे परिवारों को मिलने वाली राशि कम रह जाती थी। न्यायालय के इस निर्देश से अब घरेलू देखभाल की क्षति को एक अलग शीर्ष के रूप में, न्यूनतम 30,000 रुपये मासिक की दर से जोड़ा जाएगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि बीमा कंपनियों और न्यायाधिकरणों को मुआवजे की गणना में अधिक न्यायसंगत और यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से देशभर में लंबित और भविष्य के हजारों दावों पर असर पड़ेगा।
एक और महत्वपूर्ण व्याख्या
इसी दौरान न्यायालय ने मोटर वाहन कानून से जुड़े एक अन्य पहलू पर भी व्याख्या दी। अदालत ने कहा कि तेज बारिश के दौरान खड़े ऑटोरिक्शा पर सड़क किनारे के पेड़ की टहनी गिरने से हुई चोट को मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के अर्थ में वाहन के 'उपयोग' से उत्पन्न दुर्घटना नहीं माना जा सकता। इस व्याख्या से यह स्पष्ट हुआ कि मुआवजे के दावे में 'वाहन के उपयोग' और दुर्घटना के बीच सीधा संबंध आवश्यक है।
पहले के फैसलों की पृष्ठभूमि
सर्वोच्च न्यायालय पहले भी गृहिणियों के योगदान को रेखांकित करता रहा है। कुछ वर्ष पूर्व एक चर्चित फैसले में अदालत ने कहा था कि गृहिणी की 'काल्पनिक आय' का आकलन करते समय उसके बहुआयामी श्रम को कमतर नहीं आँका जा सकता। मुआवजे की गणना के सिद्धांतों को लेकर न्यायालय की संविधान पीठ पहले ही व्यापक दिशानिर्देश तय कर चुकी है, जिनमें भविष्य की संभावनाओं और मुद्रास्फीति को ध्यान में रखने की बात कही गई थी। ताजा फैसला उसी न्यायशास्त्र को आगे बढ़ाते हुए घरेलू देखभाल की क्षति को एक स्पष्ट और न्यूनतम मौद्रिक मूल्य प्रदान करता है, जिससे न्यायाधिकरणों के समक्ष व्याख्या की अनिश्चितता कम होगी।
देखभाल अर्थव्यवस्था का सवाल
यह फैसला 'देखभाल अर्थव्यवस्था' (केयर इकोनॉमी) पर चल रही व्यापक वैश्विक बहस से भी जुड़ता है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार यदि महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू और देखभाल श्रम को मौद्रिक रूप में आँका जाए तो वह किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद के एक बड़े हिस्से के बराबर बैठता है। समय-उपयोग सर्वेक्षणों से यह भी सामने आया है कि भारत में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक समय अवैतनिक घरेलू कार्यों में लगाती हैं। न्यायालय का यह निर्णय इसी अदृश्य योगदान को कानूनी ढाँचे में मान्यता देने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।
प्रतिक्रियाएँ
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी हलकों ने फैसले का व्यापक स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय गृहिणियों के श्रम को 'दृश्यमान' बनाता है और समाज में उनके योगदान को उचित सम्मान देता है। कई टिप्पणीकारों ने इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक प्रतीकात्मक और व्यावहारिक — दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण कदम बताया। बीमा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इससे मोटर बीमा दावों के निपटान में अधिक एकरूपता आएगी, हालाँकि इसका कुछ असर प्रीमियम और देयता-आकलन पर भी पड़ सकता है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि 30,000 रुपये की न्यूनतम सीमा को महानगरों की जीवन-लागत के अनुरूप समय के साथ संशोधित किए जाने की आवश्यकता होगी।
आगे क्या
यह फैसला अब निचली अदालतों और दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों के लिए एक बाध्यकारी मिसाल के रूप में काम करेगा। आने वाले महीनों में देखा जाएगा कि न्यायाधिकरण इस सिद्धांत को व्यवहार में किस प्रकार लागू करते हैं और बीमा क्षेत्र अपनी गणना-पद्धति में क्या बदलाव लाता है। व्यापक रूप से, यह निर्णय इस बहस को भी आगे बढ़ा सकता है कि अवैतनिक घरेलू श्रम को नीति-निर्माण, बीमा और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में किस तरह शामिल किया जाए।