प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ्रांस और स्लोवाकिया की सप्ताह भर की यात्रा पर रवाना हो रहे हैं, जहाँ वे जी-7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे और कई वैश्विक नेताओं से द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। फ्रांस यात्रा 13-14 जून को नीस और 16-19 जून को एवियाँ व पेरिस में होगी।
नई दिल्ली, 12 जून। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ्रांस और स्लोवाकिया की एक सप्ताह लंबी महत्वपूर्ण यात्रा पर रवाना हो रहे हैं। इस यात्रा के दौरान वे जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे और कई देशों के शीर्ष नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। आधिकारिक जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री 13-14 जून को फ्रांस के नीस में और 16-19 जून को एवियाँ तथा पेरिस में रहेंगे। यह यात्रा भारत की वैश्विक मंच पर बढ़ती भूमिका और प्रमुख पश्चिमी देशों के साथ गहराते रणनीतिक संबंधों के संदर्भ में अहम मानी जा रही है।
जी-7 में भारत की भागीदारी
इस वर्ष जी-7 की अध्यक्षता फ्रांस कर रहा है और भारत को 'आउटरीच' साझेदार देश के रूप में आमंत्रित किया गया है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस वर्ष की शुरुआत में भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को इस सम्मेलन के लिए निमंत्रण दिया था। सम्मेलन में वैश्विक आर्थिक असंतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के नए ढाँचे जैसे विषयों पर चर्चा होने की उम्मीद है, जिनमें भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नीस में 'भारत इनोवेट्स' और विवाटेक
फ्रांस यात्रा की शुरुआत नीस से होगी, जहाँ प्रधानमंत्री मोदी फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों के साथ 'भारत इनोवेट्स' कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। यह आयोजन भारत-फ्रांस नवाचार वर्ष का हिस्सा है। इसके अलावा दोनों नेता यूरोप के सबसे बड़े प्रौद्योगिकी आयोजनों में से एक 'विवाटेक 2026' में भी शामिल होंगे। इन कार्यक्रमों के जरिए भारत अपने स्टार्टअप, नवाचार और प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करना चाहता है और निवेश व साझेदारी के नए अवसर तलाशना चाहता है।
द्विपक्षीय वार्ताएँ
यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री कई विश्व नेताओं के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें करेंगे। इन बैठकों में व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और जलवायु जैसे क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने पर बातचीत की संभावना है। भारत और फ्रांस के बीच रणनीतिक साझेदारी पहले से ही मजबूत रही है, और इस यात्रा से रक्षा एवं उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करने की उम्मीद की जा रही है।
स्लोवाकिया यात्रा का महत्व
फ्रांस के बाद प्रधानमंत्री स्लोवाकिया की यात्रा भी करेंगे। मध्य यूरोप के इस देश के साथ भारत के संबंधों को नई गति देने की दृष्टि से यह यात्रा महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत यूरोपीय संघ के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को विविध बनाने की दिशा में काम कर रहा है, और मध्य व पूर्वी यूरोप के देशों के साथ बढ़ता संपर्क इसी व्यापक नीति का हिस्सा है।
भारत-फ्रांस रणनीतिक साझेदारी
भारत और फ्रांस के बीच रणनीतिक साझेदारी दशकों पुरानी और बहुआयामी है। रक्षा क्षेत्र में फ्रांस भारत के प्रमुख भागीदारों में से एक रहा है — चाहे वह लड़ाकू विमान हों, पनडुब्बियाँ हों या उच्च-प्रौद्योगिकी सहयोग। दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित व्यवस्था के पक्षधर हैं और इस दिशा में घनिष्ठ समन्वय करते रहे हैं। अंतरिक्ष, असैन्य परमाणु ऊर्जा, स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग का दायरा लगातार बढ़ा है। इस यात्रा को इन्हीं क्षेत्रों में चल रही पहलों को नई गति देने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
व्यापार और प्रौद्योगिकी का आयाम
आर्थिक मोर्चे पर भी यह यात्रा महत्वपूर्ण है। भारत यूरोप के साथ अपने व्यापारिक और निवेश संबंधों को विस्तार दे रहा है, और हाल के वर्षों में यूरोपीय देशों के साथ कई व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौतों पर प्रगति हुई है। 'विवाटेक' जैसे मंच पर भारतीय स्टार्टअप और तकनीकी कंपनियों की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि भारत अब केवल बाजार नहीं, बल्कि नवाचार और प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख स्रोत भी बनकर उभर रहा है। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति मैक्रों की संयुक्त उपस्थिति इन कंपनियों के लिए वैश्विक भागीदारी और निवेश के नए द्वार खोल सकती है।
विशेषज्ञों की राय
विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि जी-7 जैसे प्रभावशाली समूह में भारत का बार-बार आमंत्रित किया जाना इस बात का संकेत है कि वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक चर्चाओं में भारत को एक अपरिहार्य भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। पिछले वर्ष भी भारत को जी-7 के विस्तारित सत्र में आउटरीच साझेदार के रूप में आमंत्रित किया गया था। उनका कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण अब वैश्विक नीति-निर्माण को प्रभावित कर रहा है। हालाँकि कुछ टिप्पणीकार यह भी रेखांकित करते हैं कि ऐसी यात्राओं का असली मूल्य ठोस समझौतों और दीर्घकालिक साझेदारियों में दिखता है, न कि केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति में।
आगे क्या
इस यात्रा से निकलने वाले संयुक्त बयानों, समझौतों और घोषणाओं पर सबकी निगाहें रहेंगी। भारत के लिए यह अवसर है कि वह जलवायु, व्यापार और प्रौद्योगिकी जैसे वैश्विक मुद्दों पर अपना पक्ष मजबूती से रखे और विकासशील देशों की आवाज को आगे बढ़ाए। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यात्रा से भारत-फ्रांस और भारत-स्लोवाकिया संबंधों को किन ठोस क्षेत्रों में आगे बढ़ाया गया, और जी-7 के मंच पर भारत के हस्तक्षेप कितने प्रभावी रहे।