कोपेनहेगन, 1 जून। डेनमार्क में लंबी राजनीतिक अनिश्चितता के बाद आखिरकार नई सरकार का गठन हो गया है। प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ने 1 जून 2026 को एक मध्य-वाम अल्पमत सरकार बनाई, जिससे फ्रेडरिक्सन लगातार तीसरी बार देश की प्रधानमंत्री बनी हैं। यह सरकार ऐसे समय में बनी है जब डेनमार्क को आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अभूतपूर्व दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
60 दिनों की राजनीतिक खींचतान
24 मार्च 2026 को हुए आम चुनाव में डेनमार्क की संसद बेहद विभाजित होकर उभरी। 179 सीटों वाली संसद में फ्रेडरिक्सन की पार्टी की सीटें 50 से घटकर 38 रह गईं—यह 1903 के बाद पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन था। महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत से नाराज मतदाताओं ने फ्रेडरिक्सन के पिछले केंद्रवादी गठबंधन से बहुमत छीन लिया। इसके बाद 12 दलों के बीच 60 दिनों से अधिक चली कठिन वार्ता के बाद ही सरकार बन पाई। मध्य-दक्षिणपंथी लिबरल पार्टी द्वारा प्रतिद्वंद्वी सरकार बनाने की असफल कोशिश के बाद फ्रेडरिक्सन के लिए रास्ता साफ हुआ।
राजा से मुलाकात
सरकार गठन की घोषणा करते हुए फ्रेडरिक्सन ने कहा, 'मैं महामहिम राजा से मिलकर आई हूं और घोषणा की है कि लंबी वार्ता के बाद एक सरकार का गठन किया जा सकता है।' अल्पमत सरकार होने के कारण फ्रेडरिक्सन को महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए अन्य दलों के समर्थन पर निर्भर रहना होगा, जो आने वाले समय में उनके लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती साबित हो सकता है।
ग्रीनलैंड संकट सबसे बड़ी चुनौती
नई सरकार को सबसे पहले अमेरिका के साथ ग्रीनलैंड को लेकर तनाव का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस स्वशासित डेनिश क्षेत्र पर कब्जे की धमकी देते रहे हैं। फ्रेडरिक्सन ने इस धमकी को सख्ती से खारिज करते हुए कहा कि ऐसी कोई भी कार्रवाई 'नाटो के अंत का संकेत' होगी। यह विवाद ग्रीनलैंड के रक्षा प्रतिष्ठानों, खनिज संसाधनों और अमेरिकी पिटुफिक स्पेस बेस के इर्द-गिर्द केंद्रित है।
ट्रंप का दबाव और यूरोप की प्रतिक्रिया
जनवरी 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने के लिए दबाव तेज कर दिया था। उन्होंने कई बार कहा कि अमेरिका इसे 'किसी न किसी तरह' हासिल करेगा और सैन्य बल के इस्तेमाल से इनकार नहीं किया। इसके जवाब में फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन जैसे कई यूरोपीय नाटो देशों ने ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए तत्परता दिखाने के उद्देश्य से वहां संयुक्त सैन्य अभ्यास के लिए अपने सैनिक भेजे। ग्रीनलैंड और डेनमार्क दोनों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है।