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डेनमार्क में नई सरकार: मेटे फ्रेडरिक्सन की तीसरी बार ताजपोशी, ग्रीनलैंड पर ट्रंप के दबाव के बीच गठित हुआ अल्पमत मंत्रिमंडल

60 दिनों से अधिक की राजनीतिक खींचतान के बाद डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने 1 जून 2026 को मध्य-वाम अल्पमत सरकार का गठन किया। यह उनका लगातार तीसरा कार्यकाल है। नई सरकार के सामने ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ तनाव सबसे बड़ी चुनौती है।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 34 बार देखा
डेनमार्क में नई सरकार: मेटे फ्रेडरिक्सन की तीसरी बार ताजपोशी, ग्रीनलैंड पर ट्रंप के दबाव के बीच गठित हुआ अल्पमत मंत्रिमंडल
कोपेनहेगन स्थित क्रिश्चियनबोर्ग पैलेस, जहां डेनमार्क की संसद और सरकार स्थित है।

कोपेनहेगन, 1 जून। डेनमार्क में लंबी राजनीतिक अनिश्चितता के बाद आखिरकार नई सरकार का गठन हो गया है। प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ने 1 जून 2026 को एक मध्य-वाम अल्पमत सरकार बनाई, जिससे फ्रेडरिक्सन लगातार तीसरी बार देश की प्रधानमंत्री बनी हैं। यह सरकार ऐसे समय में बनी है जब डेनमार्क को आर्कटिक द्वीप ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अभूतपूर्व दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

60 दिनों की राजनीतिक खींचतान

24 मार्च 2026 को हुए आम चुनाव में डेनमार्क की संसद बेहद विभाजित होकर उभरी। 179 सीटों वाली संसद में फ्रेडरिक्सन की पार्टी की सीटें 50 से घटकर 38 रह गईं—यह 1903 के बाद पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन था। महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत से नाराज मतदाताओं ने फ्रेडरिक्सन के पिछले केंद्रवादी गठबंधन से बहुमत छीन लिया। इसके बाद 12 दलों के बीच 60 दिनों से अधिक चली कठिन वार्ता के बाद ही सरकार बन पाई। मध्य-दक्षिणपंथी लिबरल पार्टी द्वारा प्रतिद्वंद्वी सरकार बनाने की असफल कोशिश के बाद फ्रेडरिक्सन के लिए रास्ता साफ हुआ।

राजा से मुलाकात

सरकार गठन की घोषणा करते हुए फ्रेडरिक्सन ने कहा, 'मैं महामहिम राजा से मिलकर आई हूं और घोषणा की है कि लंबी वार्ता के बाद एक सरकार का गठन किया जा सकता है।' अल्पमत सरकार होने के कारण फ्रेडरिक्सन को महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए अन्य दलों के समर्थन पर निर्भर रहना होगा, जो आने वाले समय में उनके लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती साबित हो सकता है।

ग्रीनलैंड संकट सबसे बड़ी चुनौती

नई सरकार को सबसे पहले अमेरिका के साथ ग्रीनलैंड को लेकर तनाव का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस स्वशासित डेनिश क्षेत्र पर कब्जे की धमकी देते रहे हैं। फ्रेडरिक्सन ने इस धमकी को सख्ती से खारिज करते हुए कहा कि ऐसी कोई भी कार्रवाई 'नाटो के अंत का संकेत' होगी। यह विवाद ग्रीनलैंड के रक्षा प्रतिष्ठानों, खनिज संसाधनों और अमेरिकी पिटुफिक स्पेस बेस के इर्द-गिर्द केंद्रित है।

ट्रंप का दबाव और यूरोप की प्रतिक्रिया

जनवरी 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने के लिए दबाव तेज कर दिया था। उन्होंने कई बार कहा कि अमेरिका इसे 'किसी न किसी तरह' हासिल करेगा और सैन्य बल के इस्तेमाल से इनकार नहीं किया। इसके जवाब में फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन जैसे कई यूरोपीय नाटो देशों ने ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए तत्परता दिखाने के उद्देश्य से वहां संयुक्त सैन्य अभ्यास के लिए अपने सैनिक भेजे। ग्रीनलैंड और डेनमार्क दोनों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है।

आर्थिक और रणनीतिक दांव

ग्रीनलैंड भू-राजनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दुर्लभ खनिजों, संभावित तेल और गैस भंडारों तथा रणनीतिक आर्कटिक स्थिति के कारण वैश्विक शक्तियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग और संसाधन खुल रहे हैं, जिससे इस क्षेत्र का रणनीतिक महत्व और बढ़ गया है। अमेरिका इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानता है, जबकि डेनमार्क और ग्रीनलैंड इसे अपनी संप्रभुता का प्रश्न मानते हैं।

ग्रीनलैंडवासियों की आवाज

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष स्वयं ग्रीनलैंड के लोग हैं, जिनकी आबादी लगभग 57,000 है और जिनमें से अधिकांश स्वदेशी इनुइट समुदाय से हैं। ग्रीनलैंड एक स्वशासित क्षेत्र है जिसके पास अपने आंतरिक मामलों पर व्यापक स्वायत्तता है, जबकि रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क के अधीन है। ट्रंप के दबाव के जवाब में ग्रीनलैंड में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें लोगों ने 'ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है' और 'हमारा भविष्य हम तय करेंगे' जैसे नारे लगाए। ग्रीनलैंड के नेताओं ने स्पष्ट किया है कि भले ही वे भविष्य में पूर्ण स्वतंत्रता की आकांक्षा रखते हों, लेकिन वे किसी भी सूरत में अमेरिका का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं। यह जनभावना डेनमार्क की स्थिति को और मजबूत करती है, क्योंकि कोई भी निर्णय ग्रीनलैंड के लोगों की सहमति के बिना नहीं लिया जा सकता। यह मामला आत्मनिर्णय के अधिकार और छोटे समुदायों की संप्रभुता के सम्मान का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर है।

आगे की राह

फ्रेडरिक्सन की नई सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर घरेलू मोर्चे पर जीवन-यापन की बढ़ती लागत और विभाजित संसद में अल्पमत सरकार चलाना, और दूसरी ओर ट्रंप के बढ़ते दबाव के बीच ग्रीनलैंड की संप्रभुता की रक्षा करना। विश्लेषक मानते हैं कि यह संकट केवल डेनमार्क और अमेरिका का द्विपक्षीय मामला नहीं, बल्कि पूरे ट्रांसअटलांटिक गठबंधन और नाटो की एकजुटता की परीक्षा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि फ्रेडरिक्सन इस नाजुक कूटनीतिक संतुलन को किस तरह साधती हैं।

स्रोत: Al Jazeera
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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