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बाल अभिरक्षा विवाद: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, बच्चों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण के लिए तय किए कड़े नियम

सुप्रीम कोर्ट ने 11 जून 2026 को बाल अभिरक्षा मामलों में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अदालतें बच्चों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण का आदेश कब और किन सुरक्षा-उपायों के साथ दे सकती हैं, ताकि यह प्रक्रिया स्वयं बच्चे के लिए आघात का कारण न बने।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 30 बार देखा
बाल अभिरक्षा विवाद: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, बच्चों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण के लिए तय किए कड़े नियम
नई दिल्ली स्थित भारत का सर्वोच्च न्यायालय, जिसने बाल अभिरक्षा पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाया।

नई दिल्ली, 11 जून। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बाल अभिरक्षा (कस्टडी) से जुड़े विवादों में एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। हाल के वर्षों में पारिवारिक कानून के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक में अदालत ने अभिरक्षा विवादों में फंसे बच्चों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण को नियंत्रित करने वाले व्यापक सिद्धांत निर्धारित किए हैं। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है और किसी भी न्यायिक प्रक्रिया को इस तरह संचालित किया जाना चाहिए कि वह बच्चे के लिए मानसिक आघात का स्रोत न बन जाए।

मुख्य कानूनी प्रश्न

इस मामले में अदालत के समक्ष एक महत्वपूर्ण और अब तक अनसुलझा कानूनी प्रश्न था—अदालतों को किस परिस्थिति में किसी बच्चे के मनोवैज्ञानिक परीक्षण का निर्देश देना चाहिए, और यह सुनिश्चित करने के लिए कौन-से सुरक्षा-उपाय होने चाहिए कि यह प्रक्रिया स्वयं आघात का कारण न बने? पीठ ने माना कि बाल अभिरक्षा के विवाद अक्सर माता-पिता के बीच कटु संघर्ष में बदल जाते हैं, जिसमें बच्चे को बार-बार जांच, सवाल-जवाब और परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। ऐसी स्थिति में बच्चे का भावनात्मक स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।

बच्चे का कल्याण सर्वोपरि

न्यायालय ने दोहराया कि अभिरक्षा से जुड़े हर मामले में मार्गदर्शक सिद्धांत 'बच्चे का सर्वोत्तम हित' होना चाहिए। अदालत ने कहा कि मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन को नियमित या स्वचालित कदम के रूप में नहीं अपनाया जा सकता; इसका आदेश तभी दिया जाना चाहिए जब यह वास्तव में आवश्यक हो और इससे बच्चे के हित में कोई ठोस उद्देश्य पूरा होता हो। पीठ ने स्पष्ट किया कि परीक्षण का उद्देश्य किसी एक पक्ष को लाभ पहुंचाना या दूसरे को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि बच्चे की भलाई सुनिश्चित करना होना चाहिए।

आघात-मुक्त न्याय की दिशा

फैसले की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि अदालत ने 'आघात-मुक्त न्याय' (ट्रॉमा-फ्री जस्टिस) की अवधारणा को रेखांकित किया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि जब भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक हो, तो इसे प्रशिक्षित और योग्य बाल मनोवैज्ञानिकों द्वारा, बच्चे के लिए सहज और सुरक्षित वातावरण में किया जाना चाहिए। बच्चे को बार-बार एक ही प्रक्रिया से न गुजरना पड़े, इसके लिए परीक्षणों की पुनरावृत्ति से बचने की हिदायत दी गई। साथ ही, परीक्षण के दौरान बच्चे की गोपनीयता और गरिमा की रक्षा करने पर भी बल दिया गया।

परिवार अदालतों के लिए दिशा-निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने देश भर की परिवार अदालतों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तय किए। इनमें यह सुनिश्चित करना शामिल है कि परीक्षण का आदेश देने से पहले अदालत संतुष्ट हो कि इसकी वास्तविक आवश्यकता है; परीक्षण योग्य विशेषज्ञों द्वारा कराया जाए; और रिपोर्ट को उचित गोपनीयता के साथ संभाला जाए। अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे की उम्र, परिपक्वता और भावनात्मक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए। इस फैसले से यह उम्मीद की जा रही है कि निचली अदालतों में अभिरक्षा विवादों का निपटारा अधिक संवेदनशील और बच्चे-केंद्रित तरीके से होगा।

माता-पिता के टकराव में पिसता बचपन

अदालत ने अपने फैसले में एक गहरी सामाजिक चिंता को भी रेखांकित किया—तलाक और अलगाव के मामलों में बच्चे अक्सर माता-पिता के बीच हथियार बन जाते हैं। एक पक्ष दूसरे को नीचा दिखाने या अभिरक्षा हासिल करने के लिए बच्चे के मन में दूसरे माता या पिता के प्रति नफरत भरने का प्रयास करता है, जिसे मनोविज्ञान की भाषा में 'पैरेंटल एलिएनेशन' (माता-पिता से विमुखता) कहा जाता है। न्यायालय ने माना कि ऐसी स्थिति बच्चे के मानसिक विकास के लिए अत्यंत हानिकारक है और इससे उसे जीवनभर भावनात्मक आघात झेलना पड़ सकता है। पीठ ने अदालतों से आग्रह किया कि वे बच्चे की 'आवाज' को सुनें, लेकिन इस तरह कि वह दबाव या भय महसूस न करे। न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि जहां संभव हो, वहां मध्यस्थता (मीडिएशन) और परामर्श (काउंसलिंग) के माध्यम से विवादों को सुलझाने का प्रयास किया जाए, ताकि लंबी और कटु कानूनी लड़ाई से बचा जा सके। अदालत ने इस बात पर बल दिया कि बच्चे का दोनों माता-पिता के साथ संबंध बनाए रखना, जहां यह उसके हित में हो, उसके स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक है। यह दृष्टिकोण बाल मनोविज्ञान के आधुनिक सिद्धांतों के अनुरूप है, जो बच्चे के समग्र कल्याण को सर्वोपरि मानते हैं।

कानूनी जगत की प्रतिक्रिया

कानूनी विशेषज्ञों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि अब तक मनोवैज्ञानिक परीक्षण को लेकर कोई स्पष्ट और एकसमान दिशा-निर्देश नहीं थे, जिसके कारण अलग-अलग अदालतों में अलग-अलग व्यवहार देखने को मिलता था। कई बार बच्चों को अनावश्यक रूप से बार-बार परीक्षणों से गुजरना पड़ता था, जिससे उनका भावनात्मक संतुलन बिगड़ता था। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला न केवल बच्चों के हितों की रक्षा करेगा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को अधिक मानवीय और संवेदनशील भी बनाएगा।

दूरगामी प्रभाव

यह निर्णय आने वाले वर्षों में बाल अभिरक्षा से जुड़े सैकड़ों मामलों के लिए एक मानक बनेगा। तलाक और अलगाव के बढ़ते मामलों के बीच, जहां बच्चे अक्सर माता-पिता के संघर्ष में सबसे कमजोर पक्ष बन जाते हैं, यह फैसला एक संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण प्रदान करता है। अदालतों, मनोवैज्ञानिकों और वकीलों को अब इन दिशा-निर्देशों का पालन करना होगा, जिससे बच्चों के सर्वोत्तम हित को केंद्र में रखकर न्याय सुनिश्चित किया जा सके। यह निर्णय इस बात का प्रतीक है कि भारतीय न्यायपालिका बच्चों के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक कल्याण को कानूनी प्रक्रिया का अभिन्न अंग मान रही है।

स्रोत: Legal Services India
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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