नई दिल्ली, 11 जून। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बाल अभिरक्षा (कस्टडी) से जुड़े विवादों में एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। हाल के वर्षों में पारिवारिक कानून के सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक में अदालत ने अभिरक्षा विवादों में फंसे बच्चों के मनोवैज्ञानिक परीक्षण को नियंत्रित करने वाले व्यापक सिद्धांत निर्धारित किए हैं। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है और किसी भी न्यायिक प्रक्रिया को इस तरह संचालित किया जाना चाहिए कि वह बच्चे के लिए मानसिक आघात का स्रोत न बन जाए।
मुख्य कानूनी प्रश्न
इस मामले में अदालत के समक्ष एक महत्वपूर्ण और अब तक अनसुलझा कानूनी प्रश्न था—अदालतों को किस परिस्थिति में किसी बच्चे के मनोवैज्ञानिक परीक्षण का निर्देश देना चाहिए, और यह सुनिश्चित करने के लिए कौन-से सुरक्षा-उपाय होने चाहिए कि यह प्रक्रिया स्वयं आघात का कारण न बने? पीठ ने माना कि बाल अभिरक्षा के विवाद अक्सर माता-पिता के बीच कटु संघर्ष में बदल जाते हैं, जिसमें बच्चे को बार-बार जांच, सवाल-जवाब और परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। ऐसी स्थिति में बच्चे का भावनात्मक स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।
बच्चे का कल्याण सर्वोपरि
न्यायालय ने दोहराया कि अभिरक्षा से जुड़े हर मामले में मार्गदर्शक सिद्धांत 'बच्चे का सर्वोत्तम हित' होना चाहिए। अदालत ने कहा कि मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन को नियमित या स्वचालित कदम के रूप में नहीं अपनाया जा सकता; इसका आदेश तभी दिया जाना चाहिए जब यह वास्तव में आवश्यक हो और इससे बच्चे के हित में कोई ठोस उद्देश्य पूरा होता हो। पीठ ने स्पष्ट किया कि परीक्षण का उद्देश्य किसी एक पक्ष को लाभ पहुंचाना या दूसरे को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि बच्चे की भलाई सुनिश्चित करना होना चाहिए।
आघात-मुक्त न्याय की दिशा
फैसले की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि अदालत ने 'आघात-मुक्त न्याय' (ट्रॉमा-फ्री जस्टिस) की अवधारणा को रेखांकित किया। न्यायालय ने निर्देश दिया कि जब भी मनोवैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक हो, तो इसे प्रशिक्षित और योग्य बाल मनोवैज्ञानिकों द्वारा, बच्चे के लिए सहज और सुरक्षित वातावरण में किया जाना चाहिए। बच्चे को बार-बार एक ही प्रक्रिया से न गुजरना पड़े, इसके लिए परीक्षणों की पुनरावृत्ति से बचने की हिदायत दी गई। साथ ही, परीक्षण के दौरान बच्चे की गोपनीयता और गरिमा की रक्षा करने पर भी बल दिया गया।
परिवार अदालतों के लिए दिशा-निर्देश
सर्वोच्च न्यायालय ने देश भर की परिवार अदालतों के लिए व्यापक दिशा-निर्देश तय किए। इनमें यह सुनिश्चित करना शामिल है कि परीक्षण का आदेश देने से पहले अदालत संतुष्ट हो कि इसकी वास्तविक आवश्यकता है; परीक्षण योग्य विशेषज्ञों द्वारा कराया जाए; और रिपोर्ट को उचित गोपनीयता के साथ संभाला जाए। अदालत ने यह भी कहा कि बच्चे की उम्र, परिपक्वता और भावनात्मक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए। इस फैसले से यह उम्मीद की जा रही है कि निचली अदालतों में अभिरक्षा विवादों का निपटारा अधिक संवेदनशील और बच्चे-केंद्रित तरीके से होगा।