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सिंधु जल संधि: 'अवैध' मध्यस्थता न्यायालय के अनुपूरक फैसले को भारत ने किया खारिज, बताया 'अमान्य'

15 मई 2026 को मध्यस्थता न्यायालय ने 'अधिकतम पॉन्डेज' पर अनुपूरक फैसला सुनाया, जिसे भारत ने तत्काल खारिज कर दिया। भारत ने दोहराया कि यह न्यायालय 'अवैध रूप से गठित' है और सिंधु जल संधि अभी भी 'स्थगन' में है।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 27 बार देखा
सिंधु जल संधि: 'अवैध' मध्यस्थता न्यायालय के अनुपूरक फैसले को भारत ने किया खारिज, बताया 'अमान्य'
चिनाब नदी पर बना बगलिहार बांध—सिंधु जल संधि के तहत पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं का एक उदाहरण।

नई दिल्ली, 16 मई। सिंधु जल संधि (इंडस वाटर्स ट्रीटी) को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। 15 मई 2026 को हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (पीसीए) के अधीन गठित मध्यस्थता न्यायालय ने 'अधिकतम पॉन्डेज' (अधिकतम जल भंडारण) के तकनीकी मुद्दे पर एक अनुपूरक फैसला सुनाया। भारत ने इस फैसले को तत्काल और दृढ़ता से खारिज करते हुए इसे 'अमान्य और शून्य' (नल एंड वॉइड) करार दिया।

क्या है पूरा मामला

यह विवाद जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी प्रणाली पर बन रही किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन से जुड़ा है। 'पॉन्डेज' से तात्पर्य उस जल की मात्रा से है जिसे रन-ऑफ-रिवर (नदी के प्रवाह पर आधारित) जलविद्युत परियोजनाओं के लिए संग्रहीत किया जा सकता है। पाकिस्तान का दावा है कि भारत की इन परियोजनाओं का डिजाइन संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, जबकि भारत का कहना है कि उसकी परियोजनाएं पूरी तरह संधि के अनुरूप हैं। यह संधि भारत को पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—पर सीमित उपयोग का अधिकार देती है।

भारत का कड़ा रुख

विदेश मंत्रालय (एमईए) ने स्पष्ट किया कि 15 मई 2026 को 'अवैध रूप से गठित मध्यस्थता न्यायालय' ने अधिकतम पॉन्डेज से संबंधित जो फैसला सुनाया, वह संधि की सामान्य व्याख्या के मुद्दों पर पहले दिए गए फैसले का अनुपूरक है। भारत ने इस फैसले को खारिज करते हुए दोहराया कि यह न्यायालय अवैध रूप से गठित है और इसके किसी भी निर्णय का कोई कानूनी आधार नहीं है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि फिलहाल 'स्थगन' (अबेयंस) की स्थिति में बनी हुई है।

संधि के स्थगन की पृष्ठभूमि

यह घटनाक्रम उस व्यापक तनाव की पृष्ठभूमि में है जो अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में नागरिकों पर हुए आतंकी हमले के बाद उपजा था। उस हमले के बाद भारत ने पहली बार सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था—यह पहला अवसर था जब द्विपक्षीय तनाव ने इस छह दशक पुरानी संधि को प्रभावित किया। तब से दोनों देशों के बीच जल बंटवारे को लेकर तनातनी लगातार बढ़ती गई है।

पाकिस्तान का दावा

दूसरी ओर, पाकिस्तान ने 15 मई के फैसले का स्वागत किया। इस्लामाबाद ने कहा कि न्यायालय ने रतले और किशनगंगा परियोजनाओं के डिजाइन से जुड़े विवादों में 'पाकिस्तान की केंद्रीय स्थिति की पुष्टि की है' कि संधि पश्चिमी नदियों पर भारत की जल-नियंत्रण क्षमता पर ठोस सीमाएं लगाती है। जनवरी 2026 में पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में एक 'अरिया फॉर्मूला' बैठक आयोजित की थी, जिसमें उसके राजदूत ने भारत की स्थिति को 'अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्वों का गंभीर उल्लंघन' बताया था। अप्रैल 2026 के अंत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने चेतावनी दी थी कि सिंधु प्रणाली पर निर्भर 24 करोड़ लोगों के लिए इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

तकनीकी और कानूनी पेच

दोनों देशों के बीच मतभेद का मूल कारण मध्यस्थता प्रक्रिया की वैधता पर ही टिका है। भारत लगातार यह तर्क देता रहा है कि संधि के अंतर्गत विवादों के समाधान के लिए एक चरणबद्ध तंत्र है, और एक ही समय में 'तटस्थ विशेषज्ञ' तथा 'मध्यस्थता न्यायालय' दोनों मंचों पर समानांतर कार्यवाही कानूनी रूप से असंगत है। इसी आधार पर भारत ने मध्यस्थता न्यायालय की कार्यवाही में भाग लेने से इनकार किया है और उसके फैसलों को मान्यता देने से इनकार किया है। यह तकनीकी पेच विवाद को और जटिल बना देता है।

संधि का इतिहास और महत्व

सिंधु जल संधि पर 1960 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के तहत तीन पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलज—का जल भारत को आवंटित किया गया, जबकि तीन पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब—का अधिकांश जल पाकिस्तान को मिला। यह संधि दशकों तक दोनों देशों के बीच कई युद्धों और तनावों के बावजूद कायम रही, और इसे विश्व की सबसे सफल जल-बंटवारा संधियों में से एक माना जाता रहा। हालांकि समय के साथ भारत की बढ़ती जल आवश्यकताओं, जलवायु परिवर्तन और घटते जल संसाधनों ने इस पुरानी संधि की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत अपनी पश्चिमी नदियों के हिस्से के जल का पूरा उपयोग भी नहीं कर पा रहा था, जिसके कारण उसका बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में बहकर चला जाता था। यही कारण है कि भारत किशनगंगा और रतले जैसी जलविद्युत परियोजनाओं के माध्यम से अपने वैध हिस्से का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना चाहता है, जो जम्मू-कश्मीर के विकास और ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण हैं।

आगे क्या

विशेषज्ञ मानते हैं कि जल विवाद दक्षिण एशिया की भू-राजनीति का एक संवेदनशील पहलू बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन, घटते जल संसाधन और बढ़ती आबादी के बीच नदियों के बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ने की आशंका है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि दोनों देशों के बीच फिर से बातचीत शुरू होना दीर्घकालिक शांति की दिशा में सहायक हो सकता है। फिलहाल भारत अपने रुख पर अडिग है और किसी भी ऐसे फैसले को स्वीकार करने को तैयार नहीं है जिसे वह अवैध मानता है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि यह कूटनीतिक और कानूनी गतिरोध किस दिशा में बढ़ता है।

स्रोत: The Tribune
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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