मुंबई, 6 जून। भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने जून 2026 की द्वैमासिक समीक्षा बैठक में नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया है। यह लगातार तीसरी बैठक है जिसमें केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने नीतिगत वक्तव्य पढ़ते हुए बताया कि समिति ने 'तटस्थ' (न्यूट्रल) रुख को भी बनाए रखा है, ताकि आगे आने वाली परिस्थितियों के अनुसार दरों को घटाने या बढ़ाने की गुंजाइश बनी रहे।
लगातार तीसरी बार ठहराव
उल्लेखनीय है कि फरवरी 2025 से दिसंबर 2025 के बीच आरबीआई ने रेपो दर में कुल मिलाकर 125 आधार अंकों की कटौती की थी, जिससे यह दर 6.50 प्रतिशत से घटकर 5.25 प्रतिशत पर आ गई थी। उस आक्रामक कटौती चक्र के बाद से केंद्रीय बैंक ने रुककर इंतजार करने की रणनीति अपनाई है। मल्होत्रा ने कहा कि मौजूदा ब्याज दर का स्तर अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप है और जोखिमों के संतुलन को देखते हुए फिलहाल किसी और बदलाव की आवश्यकता नहीं है।
तेल और रुपये का दबाव
नीतिगत निर्णय ऐसे समय में आया है जब वैश्विक मोर्चे पर कई चुनौतियां एक साथ खड़ी हैं। पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए मुद्रास्फीति और चालू खाता घाटे का जोखिम बढ़ गया है। मई 2026 में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर—लगभग 97 रुपये प्रति डॉलर—के करीब पहुंच गया था। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की भारी निकासी ने भी दबाव बढ़ाया है। ऐसे माहौल में ब्याज दरों में कटौती करने से रुपये पर और दबाव पड़ने तथा पूंजी पलायन तेज होने की आशंका थी।
विकास और महंगाई का संतुलन
गवर्नर ने स्पष्ट किया कि समिति के सामने दोहरी चुनौती थी—एक ओर ऊर्जा झटके से उपजी महंगाई की चिंता और दूसरी ओर आर्थिक वृद्धि को सहारा देने की जरूरत। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का अनुमान लगभग 6.9 प्रतिशत रखा है, हालांकि इसके साथ नीचे की ओर जोखिम भी जताए गए हैं। केंद्रीय बैंक का मानना है कि घरेलू मांग, ग्रामीण खपत में सुधार और सामान्य मानसून की उम्मीद से वृद्धि को सहारा मिलेगा, लेकिन वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और ऊंची ऊर्जा कीमतें इस राह में बाधा बन सकती हैं।
उद्योग और बाजार की प्रतिक्रिया
नीतिगत घोषणा के बाद वित्तीय बाजारों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखी गई। बैंकिंग और रियल एस्टेट क्षेत्र को उम्मीद थी कि दरों में एक और कटौती से कर्ज सस्ता होगा और मांग को बल मिलेगा, लेकिन आरबीआई के सतर्क रुख ने इस उम्मीद पर विराम लगा दिया। उद्योग संगठनों ने कहा कि स्थिरता का यह संकेत दीर्घकालिक दृष्टि से सकारात्मक है, क्योंकि इससे नीतिगत भरोसा मजबूत होता है। वहीं कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि मानसून अच्छा रहा और तेल की कीमतें नरम पड़ीं तो आगामी तिमाहियों में दरों में कटौती का रास्ता खुल सकता है।