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आरबीआई ने रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रखा, लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं

गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति समिति ने जून 2026 की बैठक में रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखा और 'तटस्थ' रुख कायम रखा। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, कमजोर रुपये और वैश्विक अनिश्चितता के बीच आरबीआई ने ठहराव को प्राथमिकता दी।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 24 बार देखा
आरबीआई ने रेपो रेट 5.25% पर बरकरार रखा, लगातार तीसरी बार ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं
मुंबई स्थित भारतीय रिज़र्व बैंक का मुख्यालय, जहां से मौद्रिक नीति की घोषणा होती है।

मुंबई, 6 जून। भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने जून 2026 की द्वैमासिक समीक्षा बैठक में नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया है। यह लगातार तीसरी बैठक है जिसमें केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने नीतिगत वक्तव्य पढ़ते हुए बताया कि समिति ने 'तटस्थ' (न्यूट्रल) रुख को भी बनाए रखा है, ताकि आगे आने वाली परिस्थितियों के अनुसार दरों को घटाने या बढ़ाने की गुंजाइश बनी रहे।

लगातार तीसरी बार ठहराव

उल्लेखनीय है कि फरवरी 2025 से दिसंबर 2025 के बीच आरबीआई ने रेपो दर में कुल मिलाकर 125 आधार अंकों की कटौती की थी, जिससे यह दर 6.50 प्रतिशत से घटकर 5.25 प्रतिशत पर आ गई थी। उस आक्रामक कटौती चक्र के बाद से केंद्रीय बैंक ने रुककर इंतजार करने की रणनीति अपनाई है। मल्होत्रा ने कहा कि मौजूदा ब्याज दर का स्तर अर्थव्यवस्था की जरूरतों के अनुरूप है और जोखिमों के संतुलन को देखते हुए फिलहाल किसी और बदलाव की आवश्यकता नहीं है।

तेल और रुपये का दबाव

नीतिगत निर्णय ऐसे समय में आया है जब वैश्विक मोर्चे पर कई चुनौतियां एक साथ खड़ी हैं। पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए मुद्रास्फीति और चालू खाता घाटे का जोखिम बढ़ गया है। मई 2026 में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर—लगभग 97 रुपये प्रति डॉलर—के करीब पहुंच गया था। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की भारी निकासी ने भी दबाव बढ़ाया है। ऐसे माहौल में ब्याज दरों में कटौती करने से रुपये पर और दबाव पड़ने तथा पूंजी पलायन तेज होने की आशंका थी।

विकास और महंगाई का संतुलन

गवर्नर ने स्पष्ट किया कि समिति के सामने दोहरी चुनौती थी—एक ओर ऊर्जा झटके से उपजी महंगाई की चिंता और दूसरी ओर आर्थिक वृद्धि को सहारा देने की जरूरत। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर का अनुमान लगभग 6.9 प्रतिशत रखा है, हालांकि इसके साथ नीचे की ओर जोखिम भी जताए गए हैं। केंद्रीय बैंक का मानना है कि घरेलू मांग, ग्रामीण खपत में सुधार और सामान्य मानसून की उम्मीद से वृद्धि को सहारा मिलेगा, लेकिन वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता और ऊंची ऊर्जा कीमतें इस राह में बाधा बन सकती हैं।

उद्योग और बाजार की प्रतिक्रिया

नीतिगत घोषणा के बाद वित्तीय बाजारों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखी गई। बैंकिंग और रियल एस्टेट क्षेत्र को उम्मीद थी कि दरों में एक और कटौती से कर्ज सस्ता होगा और मांग को बल मिलेगा, लेकिन आरबीआई के सतर्क रुख ने इस उम्मीद पर विराम लगा दिया। उद्योग संगठनों ने कहा कि स्थिरता का यह संकेत दीर्घकालिक दृष्टि से सकारात्मक है, क्योंकि इससे नीतिगत भरोसा मजबूत होता है। वहीं कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि मानसून अच्छा रहा और तेल की कीमतें नरम पड़ीं तो आगामी तिमाहियों में दरों में कटौती का रास्ता खुल सकता है।

आम आदमी पर असर

रेपो दर में बदलाव न होने का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है। होम लोन, ऑटो लोन और व्यक्तिगत ऋण की मासिक किस्तों (ईएमआई) में फिलहाल कोई बदलाव की संभावना नहीं है, क्योंकि अधिकांश बैंक रेपो दर से जुड़ी बाहरी मानक दर (ईबीएलआर) के आधार पर ब्याज तय करते हैं। दूसरी ओर, जमाकर्ताओं के लिए सावधि जमा (एफडी) पर ब्याज दरें स्थिर बनी रहेंगी। विशेषज्ञ कर्जदारों को सलाह देते हैं कि वे अपनी ब्याज दर की संरचना पर नजर रखें और जरूरत पड़ने पर पुनर्वित्त के विकल्प पर विचार करें।

नकदी और तरलता पर नजर

ब्याज दरों के अलावा मौद्रिक नीति का एक महत्वपूर्ण आयाम बैंकिंग प्रणाली में नकदी (तरलता) का प्रबंधन भी है। आरबीआई ने स्पष्ट किया कि वह प्रणाली में पर्याप्त तरलता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि बैंकों के पास कर्ज देने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध रहे और मौद्रिक नीति का संचरण (ट्रांसमिशन) सुचारू रूप से हो सके। बीते वर्ष में आरबीआई ने नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर) में चरणबद्ध कटौती के माध्यम से बाजार में बड़ी मात्रा में नकदी डाली थी, जिससे बैंकों को राहत मिली। गवर्नर ने भरोसा दिलाया कि केंद्रीय बैंक खुले बाजार परिचालन (ओएमओ) और अन्य उपकरणों के माध्यम से तरलता की स्थिति पर लगातार नजर रखेगा और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थिर तरलता और दरों में ठहराव का यह संयोजन छोटे और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए कर्ज की उपलब्धता बनाए रखने में सहायक रहेगा, जो अर्थव्यवस्था के रोजगार-सृजन का एक बड़ा आधार हैं। साथ ही, वैश्विक केंद्रीय बैंकों—विशेषकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व—की दर-नीति का भी भारत के पूंजी प्रवाह और रुपये पर असर पड़ता है, जिस पर आरबीआई की पैनी नजर बनी हुई है।

आगे क्या

आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा अगस्त 2026 में निर्धारित है। तब तक केंद्रीय बैंक की निगाहें मानसून की प्रगति, कच्चे तेल की कीमतों के रुख, रुपये की चाल और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों पर टिकी रहेंगी। यदि महंगाई काबू में रहती है और बाहरी झटके कम होते हैं तो दरों में नरमी का अनुमान फिर से जोर पकड़ सकता है। गवर्नर मल्होत्रा ने भरोसा दिलाया कि रिज़र्व बैंक मूल्य स्थिरता और आर्थिक वृद्धि के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए हर आवश्यक कदम उठाने को तैयार है, और किसी भी जोखिम के प्रति सजग और सक्रिय रहेगा।

स्रोत: Business Standard
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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