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स्वास्थ्य

स्वास्थ्य सेवा में एआई की नई पहल: इंडियाएआई और आईसीएमआर के बीच समझौता, जिम्मेदार एआई से बदलेगी प्राथमिक देखभाल

इंडियाएआई और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने स्वास्थ्य सेवा में जिम्मेदार और सुलभ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 21 बार देखा
स्वास्थ्य सेवा में एआई की नई पहल: इंडियाएआई और आईसीएमआर के बीच समझौता, जिम्मेदार एआई से बदलेगी प्राथमिक देखभाल
इंडियाएआई और आईसीएमआर के समझौते से स्वास्थ्य सेवा में जिम्मेदार एआई के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नई दिल्ली, 12 जून 2026। भारत में स्वास्थ्य सेवा को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। इंडियाएआई और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने 7 मई 2026 को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य जिम्मेदार और सुलभ एआई के माध्यम से स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बनाना है। यह साझेदारी इंडियाएआई के कंप्यूटिंग ढांचे और आईसीएमआर की जैव-चिकित्सा अनुसंधान विशेषज्ञता को एक साथ लाती है।

क्या है इस साझेदारी का उद्देश्य

इस सहयोग का मुख्य लक्ष्य भारत में स्वास्थ्य सेवा के लिए एक राष्ट्रीय स्तर पर सुसंगत और अंतर-संचालनीय एआई पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है। इसके तहत आईसीएमआर के रोग-भार संबंधी आंकड़ों के आधार पर ऐसे एआई समाधान विकसित और तैनात किए जाएंगे जो प्राथमिकता वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों, खासकर गैर-संचारी रोगों (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज) का समाधान कर सकें। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा में एआई के जिम्मेदार और बड़े पैमाने पर उपयोग को आगे बढ़ाना है।

MIDAS ढांचे की भूमिका

इस साझेदारी का एक केंद्रीय हिस्सा आईसीएमआर का MIDAS ढांचा है, जिसका पूरा नाम 'मेडिकल इन्फॉर्मेशन डेटा फॉर एआई सॉल्यूशंस' है। यह आईसीएमआर का जैव-चिकित्सा अनुसंधान ढांचा है, जो इस साझेदारी में गुमनाम (एनोनिमाइज्ड) और नैतिक रूप से स्वीकृत डेटासेट और एआई मॉडल का योगदान देगा। मरीजों की निजता की रक्षा करते हुए, यह डेटा एआई आधारित स्वास्थ्य समाधानों को प्रशिक्षित करने और उन्हें अधिक सटीक बनाने में मदद करेगा। डेटा की गुणवत्ता ही किसी भी एआई मॉडल की सफलता की नींव होती है।

इंडियाएआई का योगदान

इस साझेदारी में इंडियाएआई कई महत्वपूर्ण संसाधन उपलब्ध कराएगा। इसमें रियायती दरों पर जीपीयू-आधारित और उच्च-प्रदर्शन वाला कंप्यूटिंग ढांचा शामिल है, जो एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए आवश्यक है। इसके अलावा, यह एआई कौशल पहल और 'एआईकोश' (AIKosh) प्लेटफॉर्म तक पहुंच भी प्रदान करेगा। आईसीएमआर अपनी ओर से इसी एआईकोश प्लेटफॉर्म के माध्यम से गुमनाम स्वास्थ्य अनुसंधान डेटासेट और MIDAS ढांचे के तहत एआई मॉडल व टूलकिट साझा करेगा। यह सहयोग दोनों संस्थानों की ताकत को एक साथ लाता है।

क्यों है यह महत्वपूर्ण

भारत जैसे विशाल और विविध देश में, जहां डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी एक बड़ी चुनौती है, एआई स्वास्थ्य सेवा को कई गुना बेहतर बनाने की क्षमता रखता है। एआई की मदद से बीमारियों का जल्दी पता लगाना, सही निदान करना और दूरदराज के इलाकों तक विशेषज्ञ स्तर की सलाह पहुंचाना संभव हो सकता है। खासकर गैर-संचारी रोगों जैसे मधुमेह, हृदय रोग और कैंसर के बढ़ते बोझ को देखते हुए, एआई आधारित स्क्रीनिंग और निगरानी बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। यह डॉक्टरों की मदद करेगा, उनकी जगह नहीं लेगा।

जिम्मेदार एआई पर जोर

इस साझेदारी में 'जिम्मेदार एआई' पर विशेष जोर दिया गया है, जो यह सुनिश्चित करता है कि तकनीक का उपयोग नैतिक रूप से और मरीजों के हित में किया जाए। उल्लेखनीय है कि सितंबर 2025 में इंडियाएआई और आईसीएमआर के एक संस्थान को हेल्थएआई ग्लोबल रेगुलेटरी नेटवर्क के तहत 'पायनियर कंट्रीज' के रूप में मान्यता दी गई थी। यह ब्रिटेन और सिंगापुर द्वारा सह-स्थापित एक पहल है, जो स्वास्थ्य सेवा में जिम्मेदार एआई शासन को बढ़ावा देती है। इससे भारत वैश्विक एआई नियमन में एक अग्रणी भूमिका में आ गया है।

चुनौतियां और सावधानियां

स्वास्थ्य सेवा में एआई के उपयोग के साथ कई गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हैं। सबसे बड़ी चिंता मरीजों के संवेदनशील स्वास्थ्य डेटा की सुरक्षा और निजता को लेकर है। इसके अलावा, एआई मॉडल में पूर्वाग्रह (बायस) की समस्या भी हो सकती है, अगर उन्हें असंतुलित डेटा पर प्रशिक्षित किया जाए। इसलिए यह जरूरी है कि एआई मॉडल पारदर्शी हों और उनके निर्णयों की जवाबदेही तय हो। विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि तकनीक के साथ-साथ मजबूत नैतिक और कानूनी ढांचा भी विकसित किया जाना चाहिए।

रोकथाम ही सबसे बड़ा बचाव

विशेषज्ञ बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका रोकथाम है। घरों और आसपास पानी जमा न होने देना, कूलर और गमलों की नियमित सफाई, और मच्छरदानी का उपयोग इन बीमारियों के प्रसार को काफी हद तक रोक सकते हैं। चूंकि एडीज मच्छर साफ पानी में पनपते हैं और दिन में काटते हैं, इसलिए सामुदायिक भागीदारी और जन-जागरूकता इस लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण हथियार साबित होते हैं।

आगे क्या

यह एमओयू भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई के एकीकरण की दिशा में एक मजबूत आधार तैयार करता है। आने वाले समय में इस साझेदारी के तहत विकसित किए गए एआई उपकरण देश के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में उपयोग किए जा सकते हैं। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि डेटा सुरक्षा, मरीजों की निजता और एआई मॉडल की पारदर्शिता को कितनी गंभीरता से सुनिश्चित किया जाता है। अगर इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो यह भारत में स्वास्थ्य सेवा की पहुंच और गुणवत्ता दोनों को बदल सकता है।

स्रोत: NewsGram
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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