नई दिल्ली, 12 जून 2026। सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम की दिशा में भारत ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। देश के पहले स्वदेशी HPV (ह्यूमन पैपिलोमावायरस) डीएनए टेस्ट को सफलतापूर्वक मान्य किया गया है, जो सर्वाइकल कैंसर जांच के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है। यह सफलता एम्स नई दिल्ली, आईसीएमआर के विभिन्न संस्थानों और विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी के बीच सहयोग का परिणाम है। यह अध्ययन 'इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कैंसर' में प्रकाशित हुआ है।
कौन से टेस्ट को मिली मान्यता
इस अध्ययन में मॉलबायो डायग्नोस्टिक्स के 'ट्रूनैट HPV-HR प्लस' टेस्ट को अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) द्वारा निर्धारित मान्यता मानदंडों पर खरा पाया गया। IARC विश्व स्वास्थ्य संगठन की विशेष कैंसर अनुसंधान एजेंसी है। कुल मिलाकर चार पॉइंट-ऑफ-केयर टेस्ट का मूल्यांकन किया गया, जिनमें से दो को राष्ट्रीय कार्यक्रम में उपयोग के लिए उपयुक्त पाया गया। यह भारत की सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन की कोशिशों के लिए एक बड़ा कदम है।
क्या है इस टेस्ट की खासियत
इस स्वदेशी टेस्ट की सबसे बड़ी खूबी इसकी सटीकता और किफायती होना है। यह टेस्ट 8 उच्च-जोखिम वाले HPV प्रकारों को लक्षित करता है। इस सीमित लेकिन केंद्रित दृष्टिकोण के कारण यह उन क्षणिक और कम-जोखिम वाले संक्रमणों का पता लगाने से बचता है, जिन्हें 14 प्रकारों का पता लगाने वाले टेस्ट अक्सर पकड़ लेते हैं। इसने 0.99 की असाधारण सापेक्ष नैदानिक विशिष्टता बनाए रखी, जिससे अनावश्यक द्वितीयक रेफरल, महंगी ओवर-ट्राइएज और मरीजों की चिंता में भारी कमी आने की संभावना है।
सहयोगी संस्थान
यह अध्ययन कई प्रमुख भारतीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से किया गया। इनमें एम्स नई दिल्ली, आईसीएमआर-राष्ट्रीय कैंसर रोकथाम एवं अनुसंधान संस्थान, आईसीएमआर-राष्ट्रीय प्रजनन एवं शिशु स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान, फ्रांस स्थित अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी, और भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद शामिल हैं। यह व्यापक सहयोग इस अध्ययन की विश्वसनीयता को रेखांकित करता है और दर्शाता है कि भारतीय अनुसंधान संस्थान वैश्विक मानकों के अनुरूप काम कर रहे हैं।
क्यों है यह महत्वपूर्ण
सर्वाइकल कैंसर भारतीय महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में से एक बना हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण समय पर जांच और निदान की कमी है। अब तक देश में सर्वाइकल कैंसर की जांच की पहुंच सीमित रही है, खासकर ग्रामीण और कम संसाधन वाले इलाकों में। एक किफायती और भरोसेमंद स्वदेशी टेस्ट के विकास से इस अंतर को पाटने में मदद मिल सकती है। यह टेस्ट विशेष रूप से 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को लक्षित करता है, जो इस बीमारी के सबसे अधिक जोखिम वाले समूह में आती हैं।