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चारधाम यात्रा 2026: कपाट खुले, 19 लाख से ज़्यादा पंजीकरण; जानें पूरी यात्रा की तैयारी

उत्तराखंड की पवित्र चारधाम यात्रा 2026 शुरू हो चुकी है। यमुनोत्री-गंगोत्री 19 अप्रैल, केदारनाथ 22 अप्रैल को खुले। जानें पंजीकरण, मौसम, स्वास्थ्य और नए नियमों की पूरी जानकारी।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 18 बार देखा
चारधाम यात्रा 2026: कपाट खुले, 19 लाख से ज़्यादा पंजीकरण; जानें पूरी यात्रा की तैयारी
हिमालय की ऊँचाइयों पर बसे चारधाम की यात्रा हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को खींच लाती है।

देहरादून, 12 जून। हिमालय की गोद में बसे चार पवित्र धाम—यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ—की वार्षिक चारधाम यात्रा 2026 इस वर्ष फिर श्रद्धा और उत्साह के साथ शुरू हो गई है। यात्रा की शुरुआत 19 अप्रैल को गंगोत्री और यमुनोत्री के कपाट खुलने के साथ हुई; केदारनाथ के कपाट 22 अप्रैल और बदरीनाथ के 23 अप्रैल को खोले गए। अप्रैल के अंत तक ही लगभग 19 लाख श्रद्धालु यात्रा के लिए पंजीकरण करा चुके थे। तुलना के लिए, पिछले वर्ष 51 लाख से अधिक तीर्थयात्रियों ने यह यात्रा की थी, जो इसकी बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।

अनिवार्य पंजीकरण कैसे करें

चारधाम यात्रा के लिए ऑनलाइन पंजीकरण अनिवार्य है। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब जाने वाले हर यात्री के पास पंजीकरण होना ज़रूरी है। प्रथम चरण का ऑनलाइन पंजीकरण 6 मार्च 2026 को शुरू हुआ था। यात्री उत्तराखंड पर्यटन के आधिकारिक पोर्टल और मोबाइल ऐप के ज़रिए पंजीकरण करा सकते हैं, जहाँ आधार या अन्य पहचान-पत्र और यात्रा की तारीख़ देनी होती है। बिना पंजीकरण के धामों तक पहुँच प्रतिबंधित रहती है। इसका उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करना और किसी आपात स्थिति में यात्रियों का सटीक रिकॉर्ड रखना है।

इस वर्ष के नए नियम

2026 में कुछ नई व्यवस्थाएँ लागू की गई हैं। केदारनाथ, बदरीनाथ और गंगोत्री में प्रशासन ने ग़ैर-हिंदू आगंतुकों के लिए कुछ शर्तें तय की हैं, और बदरीनाथ में सनातन धर्म में आस्था की पुष्टि करने वाला शपथ-पत्र माँगा जा रहा है। यात्रियों को सलाह है कि यात्रा से पहले संबंधित मंदिर समिति और ज़िला प्रशासन की ताज़ा अधिसूचनाओं को ज़रूर देख लें, क्योंकि भीड़-प्रबंधन के लिए दैनिक संख्या-सीमा और प्रवेश नियम समय-समय पर बदलते रहते हैं। मंदिर परिसर में मोबाइल फ़ोन और वीडियोग्राफ़ी पर भी कुछ प्रतिबंध लागू किए गए हैं।

स्वास्थ्य और ऊँचाई का ध्यान

चारों धाम ऊँचाई पर स्थित हैं—केदारनाथ लगभग 3,580 मीटर और बदरीनाथ क़रीब 3,300 मीटर की ऊँचाई पर। इतनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन कम होती है, इसलिए ऊँचाई-जनित बीमारी (एएमएस) का ख़तरा रहता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि शरीर को धीरे-धीरे ढलने दें, ख़ूब पानी पिएँ, भारी भोजन से बचें और हृदय या साँस संबंधी रोग हों तो डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें। केदारनाथ की 16 किलोमीटर की चढ़ाई के लिए शारीरिक तैयारी बेहद ज़रूरी है; कई यात्री हफ़्तों पहले से पैदल चलने का अभ्यास शुरू कर देते हैं। ज़रूरी दवाइयाँ, गर्म कपड़े और एक छोटी ऑक्सीमीटर साथ रखना समझदारी है।

मौसम और मानसून की चुनौती

यात्रा के दौरान पहाड़ी मौसम बेहद अनिश्चित रहता है। मई-जून में दिन सुहावने पर रातें ठंडी होती हैं, जबकि जून के अंत से मानसून दस्तक देने लगता है। मानसून में भूस्खलन और रास्ते बंद होने का जोखिम बढ़ जाता है, इसलिए यात्री गर्म कपड़े, रेनकोट, मज़बूत जूते और प्राथमिक उपचार किट साथ रखें। मौसम विभाग और प्रशासन की चेतावनियों का पालन करना सुरक्षित यात्रा की पहली शर्त है। पहाड़ों में मौसम कुछ ही घंटों में बदल सकता है, इसलिए यात्रा-कार्यक्रम में लचीलापन रखना ज़रूरी है।

यात्रा-योजना के सुझाव

परंपरागत रूप से यात्रा पश्चिम से पूर्व की ओर—यमुनोत्री, फिर गंगोत्री, फिर केदारनाथ और अंत में बदरीनाथ—की जाती है। पूरी यात्रा में आमतौर पर 9 से 12 दिन लगते हैं। ठहरने के लिए गढ़वाल मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस और निजी होटल उपलब्ध हैं, पर पीक सीज़न में अग्रिम बुकिंग समझदारी है। हेलीकॉप्टर सेवाएँ केदारनाथ के लिए समय बचाती हैं, पर इनकी टिकटें जल्दी ख़त्म हो जाती हैं और मौसम पर निर्भर रहती हैं। यात्रा के दौरान स्थानीय पर्यावरण का सम्मान करें—प्लास्टिक कचरा न फैलाएँ और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र को स्वच्छ रखने में सहयोग दें।

हर धाम की अपनी कहानी

चारों धामों का अपना अलग आध्यात्मिक महत्व है। यमुनोत्री यमुना नदी का उद्गम है और देवी यमुना को समर्पित है; गंगोत्री से पवित्र गंगा (भागीरथी) की धारा फूटती है। केदारनाथ बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और भगवान शिव का पावन धाम है, जो बर्फ़ से ढकी चोटियों के बीच अपनी भव्यता के लिए विख्यात है। बदरीनाथ भगवान विष्णु को समर्पित है और हिंदू धर्म के चार धामों में से एक माना जाता है। यह यात्रा केवल दर्शन-मात्र नहीं, बल्कि भारतीय आस्था, भूगोल और प्रकृति के अद्भुत संगम का अनुभव है, जहाँ हर पड़ाव अपने साथ सदियों पुरानी कथाएँ और परंपराएँ समेटे हुए है।

आगे क्या

चारधाम यात्रा केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी है—होटल, परिवहन, स्थानीय व्यापार और हज़ारों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है। आने वाले हफ़्तों में जैसे-जैसे मानसून सक्रिय होगा, प्रशासन का ध्यान भीड़-प्रबंधन और सुरक्षा पर केंद्रित रहेगा। श्रद्धालुओं के लिए संदेश साफ़ है—आस्था के साथ सतर्कता और तैयारी भी ज़रूरी है, ताकि यह पवित्र यात्रा सुखद और सुरक्षित बने। एक ज़िम्मेदार यात्री वही है जो आस्था के साथ-साथ प्रकृति और सह-यात्रियों का भी ध्यान रखे।

स्रोत: Business Today
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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