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खादी की वापसी: 2026 की गर्मियों में 'स्लो लग्ज़री' और सस्टेनेबल फ़ैशन का बोलबाला

2026 की गर्मियों का फ़ैशन प्राकृतिक रेशों की ओर लौट रहा है। खादी, लिनन, मलमल और हैंडलूम कॉटन 'स्लो लग्ज़री' की नई परिभाषा बन रहे हैं। जानें इस मौसम के टेक्सटाइल ट्रेंड।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 30 बार देखा
खादी की वापसी: 2026 की गर्मियों में 'स्लो लग्ज़री' और सस्टेनेबल फ़ैशन का बोलबाला
खादी और हैंडलूम वस्त्र 2026 की गर्मियों में 'स्लो लग्ज़री' का प्रतीक बन गए हैं।

नई दिल्ली, 12 जून। भारतीय गर्मियों की चिलचिलाती धूप में जब कपड़ों की बात आती है, तो 2026 का फ़ैशन एक स्पष्ट दिशा में मुड़ता दिख रहा है—प्राकृतिक, साँस लेने वाले और टिकाऊ रेशे। तेज़ी से बदलते 'फ़ास्ट फ़ैशन' से मोहभंग के बाद इस मौसम का मंत्र बन गया है 'स्लो लग्ज़री', जिसमें प्रामाणिकता ही नई विलासिता है। और इस बदलाव के केंद्र में है—खादी। यह बदलाव सिर्फ़ सौंदर्य का नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदार जीवनशैली की ओर झुकाव का भी प्रतीक है।

खादी की नई पहचान

कभी मोटे और खुरदरे कपड़े के रूप में देखी जाने वाली खादी अब लंबा सफ़र तय कर चुकी है। 2026 के डिज़ाइनर इसे सिल्क, मलमल और यहाँ तक कि डेनिम के साथ मिलाकर शार्प ड्रेप और आधुनिक सिल्हूट तैयार कर रहे हैं। खादी हाथ से काता और हाथ से बुना जाता है, इसकी बिजली-खपत लगभग शून्य होती है, यह ग्रामीण कारीगरों को रोज़गार देता है और भारतीय गर्मियों में बेहतरीन ढंग से साँस लेता है। यही कारण है कि खादी, जामदानी और हाथ से बुने कॉटन-ब्लेंड अब अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी नई जान पा रहे हैं। फ़ैशन-वीक के रैंप से लेकर रोज़मर्रा की अलमारी तक, खादी ने अपनी जगह फिर बना ली है।

लिनन और हेम्प: मौसम के नायक

इस गर्मी के टेक्सटाइल ट्रेंड में लिनन और हेम्प मुख्य नायक बनकर उभरे हैं—अपनी हल्केपन, मज़बूती और हवादार बनावट के कारण। ऑर्गैनिक कॉटन रोज़मर्रा के पहनावे और घरेलू वस्त्रों की रीढ़ बना हुआ है, जो कोमलता और संरचना दोनों देता है। लिनन-कॉटन ब्लेंड एक ख़ास आकर्षण है—लिनन की मज़बूती और प्राकृतिक चमक जब कॉटन की कोमलता से मिलती है, तो ऐसा कपड़ा बनता है जो टिकाऊ भी है और आरामदायक भी। ये रेशे जैव-निम्नीकरणीय (बायोडिग्रेडेबल) होते हैं, यानी पर्यावरण पर इनका बोझ बहुत कम पड़ता है।

सस्टेनेबल फ़ैब्रिक का बाज़ार

2026 में सस्टेनेबल टेक्सटाइल बाज़ार में लिनन, खादी, जूट, केले के रेशे से बना 'बनाना सिल्क', तसर सिल्क, घीचा सिल्क और हैंडलूम कॉटन अग्रणी हैं। ये सभी पर्यावरण-मित्रता, कारीगरी के मूल्य और निर्यात-तत्परता का संगम हैं। उपभोक्ता अब केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि कपड़े की उत्पत्ति, उसकी कार्बन-छाप और उसके पीछे की कारीगरी को समझकर ख़रीदारी कर रहे हैं—यह सोच फ़ैशन की दुनिया में एक बुनियादी बदलाव है। 'मेड इन इंडिया' और 'हैंडमेड' अब केवल लेबल नहीं, बल्कि गुणवत्ता और मूल्य के प्रतीक बन गए हैं।

कारीगरों की वापसी

इस प्रवृत्ति का सबसे ख़ूबसूरत पहलू है—हथकरघा कारीगरों और बुनकर समुदायों की वापसी। जब कोई खादी या जामदानी पहनता है, तो वह केवल कपड़ा नहीं, बल्कि सैकड़ों घंटों की मेहनत और पीढ़ियों के हुनर को धारण करता है। डिज़ाइनर और ब्रांड अब इन वस्त्रों को 'संग्रहणीय कला' के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पारंपरिक शिल्प दोनों को बल मिल रहा है। यह प्रवृत्ति उन लाखों बुनकरों के लिए उम्मीद की किरण है जिनकी आजीविका पिछले दशकों में मशीनी उत्पादन के दबाव में सिमट गई थी।

गर्मियों में स्टाइल के सुझाव

व्यावहारिक रूप से, इस मौसम हल्के रंग—सफ़ेद, बेज, पेस्टल और मिट्टी के रंग—सबसे आरामदायक रहते हैं क्योंकि ये गर्मी कम सोखते हैं। ढीले-ढाले कुर्ते, लिनन की शर्ट, मलमल की साड़ियाँ और खादी के को-ऑर्ड सेट इस गर्मी के बहुमुखी विकल्प हैं। कपड़ों की देखभाल भी अहम है—प्राकृतिक रेशों को हल्के हाथ से धोना और छाँव में सुखाना उनकी उम्र बढ़ाता है, जो स्थिरता के दर्शन के अनुरूप है। कम पर बेहतर ख़रीदना और हर वस्त्र को लंबे समय तक इस्तेमाल करना—यही स्लो फ़ैशन का मूल मंत्र है।

आगे क्या

स्लो फ़ैशन आंदोलन भारत में अब केवल एक चलन नहीं, बल्कि एक सोच बनता जा रहा है—कम ख़रीदो, बेहतर ख़रीदो और लंबा चलाओ। जैसे-जैसे जलवायु और पर्यावरण की चिंताएँ बढ़ रही हैं, प्राकृतिक और स्थानीय रूप से बने वस्त्रों की माँग और मज़बूत होगी। 2026 की गर्मियों का संदेश साफ़ है—फ़ैशन तभी सुंदर है जब वह धरती और कारीगर, दोनों के प्रति न्यायपूर्ण हो। आने वाले वर्षों में यह संभावना है कि टिकाऊ फ़ैशन मुख्यधारा बन जाए और 'फ़ास्ट फ़ैशन' की चमक फीकी पड़ने लगे।

युवाओं और तकनीक की भूमिका

इस बदलाव को गति देने में युवा पीढ़ी और सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है। इंस्टाग्राम और अन्य मंचों पर 'सस्टेनेबल स्टाइल', 'थ्रिफ़्टिंग' और 'हैंडलूम लव' जैसे चलन तेज़ी से फैल रहे हैं, जिससे पारंपरिक वस्त्रों को नई पहचान मिल रही है। कई स्टार्टअप और डिज़ाइनर सीधे बुनकरों से जुड़कर, बिचौलियों को हटाकर, उन्हें उचित मूल्य दिला रहे हैं और उनकी कहानियों को उपभोक्ताओं तक पहुँचा रहे हैं। क्यूआर कोड के ज़रिए कपड़े की उत्पत्ति और कारीगर की जानकारी देना अब एक नया चलन है, जो पारदर्शिता बढ़ाता है। तकनीक और परंपरा का यह मेल भारतीय हस्तकला को वैश्विक मंच पर एक टिकाऊ और प्रतिष्ठित विकल्प के रूप में स्थापित कर रहा है।

स्रोत: Anuprerna
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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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