मुख्य सामग्री पर जाएँ
शुक्रवार, 10 जुलाई 2026
जन जागरण
ब्रेकिंग
री-नीट यूजी 2026: 21 जून को दोबारा परीक्षा, 22 लाख से ज़्यादा अभ्यर्थियों के लिए क्या बदला भीषण गर्मी का कहर: तेलंगाना में लू से 16 लोगों की मौत, कई शहरों में पारा 45 डिग्री के पार फीफा विश्व कप: विनीसियस के गोल से ब्राज़ील ने मोरक्को से 1-1 की बराबरी छुड़ाई स्टेनली कप फाइनल: हरिकेन्स ने गोल्डन नाइट्स पर बनाई 3-2 की बढ़त, खिताब से एक जीत दूर न्यूयॉर्क निक्स ने 53 साल बाद रचा इतिहास, ब्रंसन के 45 अंकों से जीता NBA खिताब विमान ईंधन की मार से एयरलाइनों को राहत: कैबिनेट ने मंजूर किया 10,000 करोड़ का एटीएफ स्थिरीकरण कोष गृहिणियाँ 'राष्ट्र निर्माता' हैं: सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू श्रम का मूल्य कम से कम 30,000 रुपये मासिक आँका अमेरिकी हमले में तेन दे अरागुआ गिरोह का सरगना ढेर: ट्रंप का दावा, वेनेजुएला के सहयोग से हुई कार्रवाई फीफा विश्व कप 2026 का भव्य आगाज: मेजबान मेक्सिको ने दक्षिण अफ्रीका को 2-0 से हराया, तीन लाल कार्ड का बना इतिहास फिलीपींस में 7.8 तीव्रता का शक्तिशाली भूकंप, 1990 के बाद सबसे ताकतवर
लाइफस्टाइल

आमों का राजा संकट में: 2026 में अल्फांसो की पैदावार 75% तक गिरी, दाम आसमान पर

बेमौसम बारिश ने कोंकण की अल्फांसो (हापुस) फ़सल को इस साल बुरी तरह प्रभावित किया है। जानें 2026 के मैंगो सीज़न, जीआई किस्मों, गुणवत्ता और असली हापुस पहचानने के तरीक़े।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 26 बार देखा
आमों का राजा संकट में: 2026 में अल्फांसो की पैदावार 75% तक गिरी, दाम आसमान पर
2026 में बेमौसम बारिश से अल्फांसो की पैदावार घटी, पर आम का जादू बरक़रार है।

रत्नागिरी, 12 जून। गर्मियों की सबसे बड़ी मिठास—आम—का इंतज़ार हर भारतीय को रहता है, और इन सबमें 'आमों का राजा' कहलाने वाला अल्फांसो यानी हापुस सबसे ख़ास है। मगर 2026 का मैंगो सीज़न कोंकण के बाग़ान मालिकों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। बेमौसम बारिश के कारण इस वर्ष कोंकण क्षेत्र में अल्फांसो की पैदावार में लगभग 75 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई, जिसका सीधा असर बाज़ार में आम की उपलब्धता और क़ीमतों पर पड़ा है। यह गिरावट किसानों और आम-प्रेमियों, दोनों के लिए निराशाजनक रही।

2026 का सीज़न: मीठा पर महँगा

अल्फांसो का सीज़न आमतौर पर रत्नागिरी हापुस के लिए मध्य फ़रवरी और देवगढ़ हापुस के लिए मार्च की शुरुआत से आरंभ होता है, और इसका चरम मार्च-अप्रैल में रहता है। यह मौसम फ़रवरी से जून तक क़रीब चार महीने चलता है। इस साल अनुकूल सर्दियों ने शुरुआती फल की गुणवत्ता तो अच्छी रखी—पहले 'फ़्लश' के फल में 18 से 20 डिग्री ब्रिक्स तक मिठास दर्ज हुई और मुख्य सीज़न में यह 18 से 22 डिग्री तक रही। पर उत्पादन घटने से क़ीमतें चढ़ गईं—रत्नागिरी अल्फांसो की शुरुआती क़ीमत क़रीब 2,249 रुपये प्रति दर्जन और देवगढ़ हापुस 2,499 रुपये प्रति दर्जन तक पहुँची। यही वजह रही कि इस साल हापुस आम ख़ास और विरल बना रहा।

जीआई-टैग वाली किस्में

अल्फांसो की दो सबसे प्रतिष्ठित किस्में—रत्नागिरी हापुस और देवगढ़ हापुस—दोनों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्राप्त है और ये कार्बाइड-मुक्त रूप से उगाई जाती हैं। रत्नागिरी हापुस की बनावट थोड़ी सख़्त और सुगंध तेज़ होती है, जबकि देवगढ़ हापुस अपेक्षाकृत बड़ा और नरम होता है। इनके अलावा गुजरात के जूनागढ़-गिर क्षेत्र का केसर आम भी जीआई-टैग रखता है और अपनी केसरिया रंगत व ख़ुशबू के लिए प्रसिद्ध है। जीआई टैग उपभोक्ता को यह भरोसा देता है कि फल अपने मूल भौगोलिक क्षेत्र का प्रामाणिक उत्पाद है।

भारत की आम-विविधता

भारत आमों की विविधता का खज़ाना है। अल्फांसो और केसर के अलावा उत्तर भारत का दशहरी और लंगड़ा, बनारस का लंगड़ा, बिहार का जर्दालू, दक्षिण का बैंगनपल्ली और बंगाल का हिमसागर—हर क्षेत्र की अपनी पहचान है। हर किस्म का स्वाद, बनावट और पकने का समय अलग होता है, जिससे गर्मियों के इन महीनों में देशभर के बाज़ार रंग-बिरंगे आमों से भर जाते हैं। यही विविधता भारत को दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक देश बनाती है, और आम यहाँ केवल फल नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक है।

असली हापुस कैसे पहचानें

बढ़ती माँग और ऊँची क़ीमतों के बीच नक़ली या मिलावटी आम का ख़तरा भी रहता है। असली अल्फांसो की पहचान उसकी गहरी सुनहरी-केसरिया रंगत, बेहद महीन रेशे-रहित गूदे और तीव्र सुगंध से होती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कैल्शियम कार्बाइड से कृत्रिम रूप से पकाए गए आमों से बचें—ऐसे फल अक्सर बाहर से पीले पर अंदर से कच्चे और बेस्वाद रहते हैं और सेहत के लिए हानिकारक हो सकते हैं। प्राकृतिक रूप से पके आम की सुगंध डंठल की ओर से सबसे तेज़ आती है। ख़रीदते समय फल को हल्का दबाकर देखें—प्राकृतिक रूप से पका आम नरम पर एकसमान होता है।

सेहत और स्वाद

आम केवल स्वाद ही नहीं, पोषण का भी अच्छा स्रोत है—इसमें विटामिन ए, विटामिन सी, फ़ाइबर और एंटीऑक्सिडेंट प्रचुर मात्रा में होते हैं। हालाँकि इसमें प्राकृतिक शर्करा अधिक होती है, इसलिए मधुमेह रोगियों को संयम बरतना चाहिए। आमरस, आम पन्ना, मैंगो शेक, अचार और तरह-तरह की मिठाइयाँ—आम भारतीय रसोई का अभिन्न हिस्सा है। कच्चे आम से बना आम पन्ना गर्मियों में लू से बचाव का पारंपरिक और कारगर उपाय माना जाता है।

आगे क्या

जलवायु परिवर्तन और बेमौसम बारिश आम की खेती के लिए बढ़ती चुनौती बनते जा रहे हैं, और 2026 की गिरावट इसी ओर इशारा करती है। किसान अब बेहतर सिंचाई, मौसम-पूर्वानुमान और रोग-प्रबंधन पर ज़ोर दे रहे हैं ताकि भविष्य की फ़सलें सुरक्षित रहें। उपभोक्ताओं के लिए संदेश यह है कि इस सीज़न आम का आनंद लें, पर भरोसेमंद विक्रेता और जीआई-प्रमाणित किस्मों को प्राथमिकता दें। दीर्घकाल में जलवायु-अनुकूल खेती की तकनीकें ही आमों के राजा का भविष्य सुरक्षित रख सकती हैं।

आम का अर्थशास्त्र और निर्यात

आम भारत के लिए केवल मौसमी स्वाद नहीं, बल्कि एक बड़ा कृषि-आर्थिक उद्योग भी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा आम उत्पादक है और अल्फांसो तथा केसर जैसी प्रीमियम किस्में खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका तक निर्यात होती हैं। इस वर्ष पैदावार में गिरावट का असर निर्यात पर भी पड़ा, जिससे विदेशी बाज़ारों में भारतीय हापुस की क़ीमतें और ऊँची रहीं। बाग़ान मालिकों से लेकर पैकहाउस मज़दूरों, परिवहनकर्ताओं और फल विक्रेताओं तक—लाखों लोगों की आजीविका इस फ़सल से जुड़ी है। यही कारण है कि एक कमज़ोर सीज़न का असर पूरी आपूर्ति-शृंखला पर महसूस होता है, और किसानों के लिए फ़सल-बीमा तथा बेहतर भंडारण-सुविधाएँ ज़रूरी मानी जा रही हैं।

स्रोत: AlphonsoMango.in
शेयर: Facebook Twitter WhatsApp
अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

के सभी लेख देखें अजय राज →

टिप्पणियाँ (0)

रोज़ की मुख्य खबरों से जुड़े रहें

हमारे न्यूज़लेटर की सदस्यता लें और कोई खबर न चूकें।