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श्री अन्न की वापसी: गर्मियों में बाजरा-ज्वार-रागी क्यों बन रहे हैं भारत की नई थाली का सितारा

बाजरा, ज्वार, रागी और छोटे अनाज—'श्री अन्न'—पोषण और शीतलता के लिए फिर लोकप्रिय हो रहे हैं। जानें गर्मियों में मिलेट्स के लाभ, किस्में, और रोज़मर्रा की रसोई में इन्हें शामिल करने के तरीक़े।

अजय राज अजय राज 14 जून 2026, 09:08 AM 1 मिनट में पढ़ें 18 बार देखा
श्री अन्न की वापसी: गर्मियों में बाजरा-ज्वार-रागी क्यों बन रहे हैं भारत की नई थाली का सितारा
बाजरा, ज्वार और रागी जैसे 'श्री अन्न' पोषण और शीतलता के लिए फिर लोकप्रिय हो रहे हैं।

नई दिल्ली, 12 जून। भारतीय थाली में सदियों से मौजूद रहे मोटे अनाज—जिन्हें अब सम्मान के साथ 'श्री अन्न' कहा जाता है—एक बार फिर रसोई के केंद्र में लौट रहे हैं। बाजरा, ज्वार, रागी, कंगनी (फ़ॉक्सटेल), सांवा (बार्नयार्ड), कोदो और कुटकी जैसे मिलेट्स को उनके बेजोड़ पोषण के कारण आधुनिक आहार-विशेषज्ञ 'सुपरफ़ूड' मान रहे हैं। ख़ास तौर पर गर्मियों में, जब शरीर को शीतलता और हल्के पाचन की ज़रूरत होती है, ये अनाज एक आदर्श विकल्प बनकर उभरे हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2023 को 'अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष' घोषित किए जाने के बाद से इनकी लोकप्रियता और बढ़ी है।

गर्मियों के लिए आदर्श क्यों

फ़ाइबर, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और ज़रूरी खनिजों से भरपूर कुछ मिलेट्स शरीर की गर्मी कम करने और 'पित्त दोष' को शांत करने में मदद करते हैं, जिससे ये गर्मियों के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। सांवा (बार्नयार्ड मिलेट) और ज्वार जैसे अनाजों में शरीर को ठंडक देने के अद्भुत गुण होते हैं। इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स गेहूँ-चावल की तुलना में कम होता है, इसलिए ये रक्त-शर्करा को संतुलित रखने में सहायक हैं और देर तक पेट भरे रहने का अहसास देते हैं। यही कारण है कि वज़न नियंत्रित करने वाले और मधुमेह के प्रति सजग लोग इन्हें अपना रहे हैं।

हर अनाज का अपना गुण

हर मिलेट का अपना पोषण-मूल्य है। रागी (फ़िंगर मिलेट) कैल्शियम का बेहतरीन स्रोत है, जो हड्डियों के लिए लाभकारी है—यही कारण है कि इसे बच्चों और बुज़ुर्गों के आहार में ख़ास तौर पर शामिल किया जाता है। बाजरा आयरन और ऊर्जा से भरपूर है, ज्वार ग्लूटेन-मुक्त और पाचन के लिए हल्का है, जबकि छोटे अनाज जैसे कोदो और कुटकी फ़ाइबर तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध हैं। यही विविधता मिलेट्स को संतुलित आहार का अहम हिस्सा बनाती है। ग्लूटेन से परहेज़ करने वालों के लिए ये अनाज एक सुरक्षित और पौष्टिक विकल्प हैं।

सरकारी पहल और जागरूकता

भारत में मिलेट्स को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास हो रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफ़एसएसएआई) अपनी 'ईट राइट इंडिया' पहल के ज़रिए श्री अन्न को संतुलित और विविध आहार का हिस्सा बनाने को बढ़ावा दे रहा है। स्कूल कैंटीन, रक्षा मेस और रेलवे के मेन्यू के लिए क्षेत्र-विशिष्ट मिलेट व्यंजन तैयार किए गए हैं। दूरदर्शन के सहयोग से 'द फ़्लेवर्स ऑफ़ श्री अन्न' जैसे कार्यक्रम विविध और स्वादिष्ट मिलेट व्यंजनों को घर-घर पहुँचा रहे हैं। इन प्रयासों ने मिलेट्स को एक 'ग़रीब का अनाज' की पुरानी छवि से निकालकर एक प्रतिष्ठित सुपरफ़ूड बना दिया है।

रसोई में मिलेट्स कैसे शामिल करें

मिलेट्स को रोज़मर्रा के भोजन में शामिल करना आसान है। नाश्ते में रागी का दलिया या डोसा, दोपहर में बाजरे या ज्वार की रोटी, और शाम के नाश्ते में मिलेट से बनी खिचड़ी या उपमा—विकल्प अनगिनत हैं। गर्मियों में रागी का माल्ट या छाछ के साथ ज्वार का व्यंजन शरीर को ठंडक देता है। मिठाई के शौक़ीन रागी के लड्डू या हलवा बना सकते हैं। शुरुआत धीरे-धीरे करें—सप्ताह में दो-तीन बार एक समय का भोजन मिलेट से बदलकर भी बड़ा फ़र्क़ पड़ता है। आजकल बाज़ार में मिलेट से बने रेडी-टू-कुक उत्पाद भी उपलब्ध हैं, जो व्यस्त जीवनशैली में सुविधा देते हैं।

किन बातों का ध्यान रखें

मिलेट्स को पकाने से पहले अच्छी तरह भिगोना और धोना पाचन को आसान बनाता है। चूँकि इनमें फ़ाइबर अधिक होता है, इसलिए शुरुआत में मात्रा सीमित रखें ताकि पेट इन्हें सहज रूप से अपना ले। संतुलन ज़रूरी है—किसी एक अनाज पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग मिलेट्स को घुमा-फिराकर खाना बेहतर है। ताज़े और साफ़-सुथरे, अच्छी गुणवत्ता के अनाज चुनें। मिलेट्स को सूखी और हवादार जगह में रखना उनकी ताज़गी बनाए रखता है।

आगे क्या

मिलेट्स की वापसी केवल एक खान-पान का चलन नहीं, बल्कि स्थिरता और स्वास्थ्य दोनों की दिशा में एक क़दम है—ये फ़सलें कम पानी में उगती हैं, सूखा-सहिष्णु हैं और छोटे किसानों के लिए लाभकारी हैं। जैसे-जैसे लोग जीवनशैली से जुड़े रोगों के प्रति सजग हो रहे हैं, श्री अन्न की माँग और बढ़ने की संभावना है। पुरानी थाली की यह वापसी दरअसल भविष्य के स्वस्थ और टिकाऊ आहार की ओर लौटना है। जलवायु परिवर्तन के दौर में पानी की कम खपत वाली ये फ़सलें खाद्य-सुरक्षा का भी एक मज़बूत आधार बन सकती हैं।

परंपरा से आधुनिक थाली तक

दिलचस्प बात यह है कि मिलेट्स भारत के लिए कोई नई खोज नहीं, बल्कि हज़ारों साल पुरानी परंपरा हैं। हरित क्रांति के दौर में जब गेहूँ और चावल की पैदावार पर ज़ोर बढ़ा, तो मोटे अनाज धीरे-धीरे थाली से दूर होते गए और इन्हें 'पिछड़ा' भोजन मान लिया गया। अब विज्ञान और आहार-शास्त्र दोनों इनकी ओर लौट रहे हैं। शहरी कैफ़े, स्टार्टअप और सेहत के प्रति सजग युवा वर्ग मिलेट से बने बर्गर, कुकीज़, पास्ता और एनर्जी बार तक अपना रहे हैं। यह पुनर्जागरण ग्रामीण और शहरी, परंपरा और नवाचार के बीच एक ख़ूबसूरत सेतु बना रहा है, जहाँ दादी-नानी की रसोई का ज्ञान आधुनिक पोषण-विज्ञान से जुड़कर एक नई पहचान पा रहा है।

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अजय राज
द्वारा लिखित
अजय राज
Editor-in-Chief

जनजागरण के संस्थापक और प्रधान संपादक। पत्रकारिता में 15+ वर्षों का अनुभव, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबरों पर पैनी नज़र।

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